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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 511 में से

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पृष्ठ 482

४८२ ] [ श्रीशारदा तिलक
धरणेरुदये कुर्यात्स्तम्भनं वश्यमात्मवित् ।
शान्तिकं पौष्टिकं कर्म तोयस्य समये वसोः ।४३
मारणादीनि मरुतो विपक्षोच्चाटनादिकम् ।
क्ष्वेदादिनाशनं शान्तमुदये च विहायसः ।४४
अंगुलीर्दृढं बध्वा करणानि समाहितः ।
अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां विलोचने ।४५
नासारन्ध्रे मध्यमाभ्यामन्त्याभिर्वदनं दृढम् ।
वध्वात्मग्रणामनसामेकत्व ममनुस्मरन् ।४६
धारयेन्मारुतं सम्यग्योगोऽयं योगिबल्लभः ।
नादः सञ्जायते तस्य क्रमादभ्यसतः शनैः ।४७
द्वादश अङ्गुलों के मान से यह स्थित है, । इसी से प्राण यह
नाम से पुकारा जाता है । रम्भ और शुद्ध मृदु आसन पर जो पट्-
अजिन् और कुशा का होता है । उस पर योगी आसन बाँधकर योग
मार्ग में परायण हुआ करता है । देह में भूतोदय का ज्ञान प्राप्त होता
है जोकि विधि पूर्वक कठोर वायु द्वाराकिया जाता है ।३६-४०। विद्वान्
पुरुष को तद्भूत देह की दृढ़ता की प्राप्ति के लिये जाप
करना चाहिये । दोनों पुटों के नीचे दन्ड के आकार वाली भूमि की
गति है ।४१। जल और पावक के ऊपर नभस्वान की तिर्यक् गति
है । मध्य में व्योम की गति है-इस रीति से भूतों का उदय बताया
गया है ।४२। आत्मवेत्ता की धरणी के उदय में स्तम्भन और वैश्य
करना चाहिये । वसु के समय तोव (जल) का शान्तिक और पौष्टिक
कर्म करने चाहिये ।४३। आकाश के उदय में धरणादिक शरे और
मरुत से विमक्ष का उच्चाटन आदि करे, क्षेडा का विनाशन शान्त
करे ।४४। परम सावधान होकर शङ्गुलियों से श्रवणेन्द्रिय
को दृढ़ता से बद्ध करके दोनों अंगूठों से दोनों कानों को तर्जनी