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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 511 में से

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पृष्ठ 478

४७८ ] [ श्रीशारदातिलक
धारयेत्पूरितं योगी चतुः षष्ट्या तु मात्रया ।
सुषुम्णा मध्यगं सम्यक् द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः ।१७
नाड्या पिङ्गलया चैनं रेचयेद्योगवित्तमः ।
प्राणायाममिमं प्राहुर्योगशास्त्रविशारदाः ।१८
भूयो भूयः क्रमात्तस्य व्यत्यासेन समाचरेत् ।
मात्रावृद्धिक्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश ।१६
इसको योगियों के द्वारा परम पूजित भद्रासन कहा गया है ।
ऊरू और पादों को क्रम से न्यस्त करे तथा प्रत्यंग मुखागुलि वाले
जानुओं को करे । करों को निर्धारित करे—यह परमोत्तम वज्रासन
कहा गया है । एक पैर को नीचे करके तथा ऊरुओं को विन्यस्त करे ।
योगी को सीधे शरीर वाला होना चाहिये—इसको वीरासन बताया
गया है ।१६। योगी चौसठ मात्रा से पूरक धारण करे और सुषुम्ना से
मध्य में रहने वाले को भली भाँति बत्तीस मात्रा से शनैः शनैः पिंगला
नाड़ी के योग के ज्ञाता को इसका रेचन करना चाहिए । योगशास्त्र के
विद्वान् इस प्रकार से करने को प्राणायाम कहा करते हैं ।१७-१८। पुनः
व्यत्यास से इस प्रकार समाचरण करे । मात्राओं की वृद्धि के क्रम से
भली भाँति षोड़श और द्वादश करे ।१६।
प्राणो ऽमो हि द्विविधः सगर्भोऽगर्भएव च ।
जपध्यानादियियुक्तं सगर्भं त विदुबुर्धाः ।२०
तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः ।
क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्गमोऽधमः ।२१
मध्यमः कम्पसंयुक्तोभूमित्यागः परोमतः ।
उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यविच्चीलनमिष्यते ।२२
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् ।
बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते ।२३
अंगुष्ठगुल्फजानूरुसीवनीलिङ्गानाभिषु ।
हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां तोनसिः ।२४