सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 469

एकोनविंश पटल ] [ ४६६
धारण करने वाले काम देव के शत्रु देव की शक्तिमत्ता की हेतु निश्चय
ही आप हैं ।८७। हे माता ! समस्त लोकों के द्वारा पूजित गङ्गा के
वैशिष्ट्य का कारण मैं उसी को जानता हूँ । आपके चरण कमल के
पराग से पवित्र भगवान् शम्भु की जटाओं में जो निरन्तर परिवर्तन
होता है ।८८।
आनन्दयेत् कुमुदिनीमधिपः कलानां
नान्यामिनः कमलिनीमथनेतरां या ।
एकस्य मोदनविधौ परमकं इष्टे
त्वत्तुप्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्टया ।८६
आद्याप्यशेषजगतां नवयौवनासि ।
शैलादिराजतनयाण्याति कोमलासि ।
त्रय्या प्रसूरपि तया न समीक्षितासि ।
ध्येयासि गौरि ! मनसो न पथि स्थितासि ।६०
त्तासाद्य जन्म मनुजेषु चिराद् दुरापं
तत्रापि पाटवमवाप्य मिजेन्द्रियाणाम् ।
नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्र ! ये त्वां
निःश्रेणिकाग्रमविरुह्य पुनः पतन्ति ।६१
कर्पूरचूर्णहिमबारिविलोलितेन
ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धः ।
आराधयन्ति हि भवानि ! समुत्सुकात्वां
ते खल्वशेषभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ।६२
आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सराजे
सुप्तहिराजसदृशी विरचय्य विश्वम् ।
विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती पद्मानि
पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ।६३
तन्निर्गतामृतरसैरभिषिक्तगात्री
मार्गेण तेन निलय पुनरप्यवाप्त ।