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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 511 में से

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पृष्ठ 390

३६० ] [ श्री शारदा तिलक
अभिचारे ज्वरे तीव्रे घोरोन्मादे शिरोगदे ।
असाध्यरोगश्वेडादौ महादाहे महाभये ॥ १२५
होमोऽयंशान्तिदः प्रोक्तः सर्वसम्पत्प्रदायकः।
द्रव्यैरेतैः प्रजुहुयात्त्रिजन्मसु यथाविधि ॥१२६
भोजयेन्मधुरैस्साज्यैर्ब्राह्मणा-वेदपारगान् ।
दीर्घमायुरवाप्नोति वाञ्छितां विन्दति श्रियम् ॥१२७
एकादशाहुतीर्नित्यं दूर्वाभिर्जुहुयाद्बुधः ।
अपमृत्युजितेषु स्यादायुरारोग्यवर्द्धनः ॥२८
दस से अधिक द्विजों को नित्य मधुर से अन्वित पदार्थों का भोजन
करावे । विकारों अर्थात् रोगों के अनुरूप ही मन्त्रधारी होम के दिनों
की वृद्धि कर देवे ।१२२। जो इसमें होता होवें उनको पुष्कल दक्षिणा
देनी चाहिए और अरुण वर्ण वाली दुधार गाय को देवे । इसके पीछे अपने
गुरुदेव को देवता की बुद्धि से ही धनादि के द्वारा प्रीणित करना
चाहिए ।१२३। इस विधि से साध्य कृत्या द्रोह और ज्वर आदि से मुक्त
होकर बहुत समय तक सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहा करता है ।१२४।
अभिचार में, तीव्र ज्वर में, घोर उन्माद में, शिरोरोग में, असाध्य रोग
श्वेडादि में, महादाह में, महाभय में यह होम शान्ति देने वाला कहा है
और यह सब प्रकार की सम्पदाओं के प्रदान करने वाला होता है। विधि
के सहित त्रिजन्मा (अग्नि) में इन द्रव्यों से होम करे । १२५।१२६। इसके
अनन्तर वेदों में पारगामी विद्वान् ब्राह्मणों को घृत के सहित मधुर
पदार्थों के द्वारा भोजन करावे । वह मनुष्य दीर्घ आयु की प्राप्ति किया
करता है और अपनी मनोवांछित श्री का लाभ भी किया करता है
।१२७। बुध पुरुष एकादश आहुतियां नित्य दूर्वाओं के द्वारा देवे । वह
मनुष्य अपमृत्यु पर विजेता हो जाता है और आयु तथा आरोग्य वाला
होता है ।१२८।
त्रिजन्मसु सुधावल्लीकाश्मरीबकुलोद्भवैः ।
समिद्वरैःकृतोहोमः सर्वमृत्युग्रहापहः ॥१२६