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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

षोडष पटल ] [ ३७१
शिरोवदनहृत्कुक्षि सोरुपादद्वये पुनः ।
हृदि वक्त्राम्बुजे टङ्कमृगाभयवरेष्वथ ।६
वक्त्रांसहृत्सु पादोरुजठरेषु क्रमान्न्यसेत् ।
मूलमन्त्रस्य षड्वर्णांन्यथावद्देशिकोत्तमः ।१०
मूर्ध्नि भालादरांसेषु हृदये ताः पुनर्न्यसेत् ।
पश्चादनेन मन्त्रेण कुर्वीत व्यापकं सुधीः ।११
नमोऽस्तु स्थाणुरूपायज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने ।
चतुर्मूत्तिवपुश्छायाभासिताङ्गाय शम्भवे ।१२
एव न्यस्तशरीराऽसौ चिन्तयेत्पार्वतीपतिम् ।१३
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसम् ।
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानम् ।
विश्वाद्यं विश्वरूपनिखिभयहरलं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ।१४
पूर्व, याम्य, वरुण, उत्तर और मध्य वक्त्र पत्रों में मन्त्र के अङ्गों
का न्यास करना चाहिए। पीछे जाति युक्तों को षट् क्रम से न्यास
करे । उसके अनन्तर रक्षा के लिये गोलक न्यास करना चाहिए इसके
अनन्तर हृदय में--मुख, अंसों में दोनों उरुओं में, कण्ठ में नाभि में,
दोनों पार्श्वों में-बाहुओं में-पदों में और साग्र सन्धियों में विन्यास करे
।६-८। शिर, मुख, हृदय, कुक्षि, दोनों उरु, दानों पाद, मुख
कमल, टंक ( परशु ) -मृग, अभय, वर, वक्त्र, अस जठर में
क्रम से न्यास करना चाहिए । उत्तम आचार्य को चाहिये कि
वह मूल मन्त्र के छै वर्णों को रीत्यानुसार उनका मूर्धा, भाल,
उदर--अंस और हृदय में पुनः न्यास करे । पीछे इस मन्त्र के द्वारा
सुधी पुरुष व्यापक न्यास करे ।६-११। स्थाणु रूपाय ज्योतिर्लिङ्गा-
मृतात्मने चतुर्मूत्ति वपुश्छाया भासिताङ्गाय शम्भवे नमः । इस
प्रकार से शरीर में न्यास करने वाला यह पार्वती के स्वामी का
ध्यान करना चाहिये ।१२-१३। अब ध्यान बतलाया जाता है-चाँदी