शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 511 में से
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इस पद के अन्त में 'वल्लभाय' कहे और अन्त ये 'स्वाहा, कहना
चाहिए ॥११२
अनुष्टुप् मन्त्र आख्यातो गोपालस्य जगत्पतेः ।
अनङ्गः कृष्णगोविन्दो ङेन्तावष्टाक्षरो मनुः ॥११३
प्राक्प्रत्यग्दक्षिणादविविधवदभिलिखेत्स्पष्टरेखाचतुष्कं
कोणोद्यच्छूलयुक्तं वलययुगयुतं मध्यपूर्वं तदन्तरम् ।
श्लोकस्यार्णान्परस्ताद्वसुपदविवरेष्वष्टवर्णं लिखित्वा
तद्वा ो द्वादशार्णे स्तदनु परिवृत देवकीपुत्रयन्त्रम् ॥११४
तं सुकीदेवदेवे त तं देने वरतो रनम् !
त वा रतो ढत ख्यातं देवकीसुतम् ।११५
लिखित भूर्ज्जपत्रादौ तन्त्रमेतद्यथाविधि ।
विधृतं बाहुना नित्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥११६
पलाशवृक्षफलके लिखितं साधुसाधितम् ।
गोस्थाने निखनेदेतद्गवां वृद्धिमवैत्सदा ॥११७
यह जगत्पति गोपाल का अनुष्टुप् मन्त्र बताया गया है काम
बीज और चतुर्थ्यन्त कृष्ण तथा गोविन्द होते हैं । यह आठ अक्षरों
वाला मन्त्र होता है ॥११३। अब काम लिङ्ग मन्त्र बताया जाता है—
पूर्व और पश्चिम में दो रेखाएं लिखे तथा दक्षिण-उत्तर में दो रेखाएं
लिखें । इस तरह से चार रेखाएं लिखनी चाहिए । मध्य कोण में कर्ण
सूत्र चतुष्टय देवे । इससे शूल का आकार हो जाता है जो दो वृत्तों से
युक्त करे । मध्य कोष्ठ से आरम्भ करके मध्य कोष्ठ में ही समाप्ति करे
श्लोक के आठ वर्णों को आगे आठ पद विवरों में लिखे । उसके बाहर
बारह वर्णों से उसके पीछे परिवृत करे । यह देवकी पुत्र का यन्त्र होता
है ॥११४। सुकी देव में त-त देव में---त वरतो रत - अथवा तं रतो
रूढ----त ख्यात और तं देवकी सुतम् है ॥११५। इस यन्त्र को विधि के
साथ भोज पत्र आदि पर लिखे । इसे बाहु पर नित्य विधृत करे तो यह
सब कामनाओं के फल को प्रदान करने वाला होता है ॥११६।