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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 511 में से

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पृष्ठ 351

पंचदश पटल ] [ ३५१
मन्त्रधारी इस विधान से महारोग से मुक्त हो जाया करता है।
पीपल की समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम दूसरों के द्वारा हरण
किये हुए धन के प्रदान करने वाला होता है ।५७। घृत में अक्त की हुई
दूर्वा के होम के द्वारा महान् भय से छुटकारा पा जाया करता है ।५८।
जिसके नाम से युक्त मन्त्र का दश सहस्र की संख्या में जप करे तो वह
मानव उसके दान की ही भाँति हो जाता है-इसमें विचारणा कभी
नहीं करनी चाहिए ।५६। यहाँ पर इस विषय में बहुत अधिक कथन से
क्या प्रयोजन है। इस मन्त्र के द्वारा साधक अपने सभी कामों का साधन
करता है और साक्षात् दूसरे विष्णु के ही समान हो जाता है ।६०।
अब श्री कर मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--उत्तिष्ठ श्री कहकर
ककार और रेफ कह कर स्वाहा-यह पद कहे। यह मन्त्र आठ अक्षरों
वाला होता है ।६१।
ऋषिरस्य भवेद्वामः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् ।
श्रीकराख्यो हरिः प्रोक्तो देवतास्य मनीषिभिः ।६२
हृदयं भीषय द्वन्द्वं त्रासयद्वितयं शिरः ।
शिखाप्रमर्दययुगं वर्मपध्वंसयद्वयम् ।६३
अस्त्रं रक्षयुगं सर्वे हुतन्ताः समुदीरिताः ।
मूर्द्धनि नेत्रद्वये कण्ठे हृदयोदरयोः पुनः ।६४
उरुजङ्घापदद्वन्द्वे मन्त्रवर्णान्प्रविन्ससेत् ।
मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोस्य मुखमासीदिमं मनुम् ।६५
बाहूराजन्यः कृतोऽयं न्यैस्तत्र्यो बाहुयुग्मके ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् ।६६
पादद्वये न्यसेन्मत्रं पद्भ्यां शूद्रो अजायत ।
चक्रं शंखं गदां पद्मं हस्ताग्रेष्वथ विन्ययेत् ।६७
इस मन्त्र का ऋषि वाम देव है और पंक्ति इस का छन्द कहा गया
मनीषियों ने इस मन्त्र का देवता श्रीकर नाम वाले हरि भगवान् को
बताया है ।६२। भीषय का द्वन्द्व इसका हृदय है और त्रासय का जोड़ा