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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 511 में से

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पृष्ठ 349

पंचदश पटल ] [ ३४६
त्रासय' कहे । प्रत्येक में दो ठकार वर्म हैं। चक्राय नमः यह कहे-यह
तीसरा मन्त्र कहा है ।४४-४६।
खड्गतीक्ष्णपदान्ते स्याच्छिन्दयुग्मं हुमादि च ।
चतुर्थोऽयं मनुः प्रोक्तः, कौमोदकि महाबले ।४७
सर्वासुरान्तकि पदं प्रसीदयुगवर्मफट् ।
स्वाहान्तोऽयं मनुः प्रोक्तःसद्भिः कौमोदकी प्रिय ।४८
अङ्कुशान्ते कट्टयुगं षष्ठोऽयं मनुरीरितः ।
संवर्त्तका मुशलं पोथयद्वितयं पुनः ।४६
हुँ फट् द्विष्टान्तोमन्त्रोऽन सप्तमः परिकीर्तितः ।
पाशबन्धद्वयं पश्चादाकर्षय पदद्वयम् ।५०
वह्निजायावधिः सद्भिरष्टमो मन्त्रईरितः ।
खड्ग तीक्ष्ण पद के अन्त में छिन्द छिन्द में ये कहे और हुम आदि
यह चौथा मन्त्र कहा गया है । 'कौमोदिक-महाबले-सर्वा
सुरान्तकि' ये पद कहे दो वार प्रसीद पद कहे तथा वर्म और फट् कहे
यह स्वाहा अन्त वाला सत्पुरुषों ने मन्त्र कहा है । कौमोदकी प्रिय-यह
पद कहकर अन्त में अंकुश पद कहे । फिर दो बार 'कट्ट' यह पद
कहे । यह छठवां मन्त्र कहा गया है । सम्वर्त्तक-इन पद के अन्त में
मुशलं-यह पद होता है और फिर दो बार 'पोथय' यह शब्द बोले ।
इसके अन्त में हुँफट् और दो ठकार कहे-यह सातवाँ मन्त्र कहा गया
है । फिर दो वार पाश बन्ध-यह तथा दो बार 'आकर्षय,-यह पद
बोले । अन्त में 'स्वाहा' यह कहे तो सत्पुरुषोंके द्वारा यह आठवां मन्त्र
कहा गया है । इसके पीछे वज्रादि आयुधों के सहित लोकेशों का
अर्चन करना चाहिए ।४७-५१।
लोकेशान् पूजयेत्पश्चाद्वज्राद्यै रायधैः सह ।५१
इत्थमभ्यर्चयेन्नित्यं यथावत्पुरुषोत्तमम् ।
प्राप्नोति महतीं लक्ष्मीं सौभाग्यमतुलं यशः ।५२
आयुरारोग्यमैश्वर्य्यंमनोभीष्टानि विन्दति ।
ह्यारिकुसुमैर्देवमर्चयित्वा यथाविधि ।५३