शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ ] [ श्री शारदा तिलक
मन्थोत्तंमसंयुक्तमङ्गजैं कामदायिनि ।
हुँ शिखापरमोपेतसुभगाक्षरसंयुतम् । १५
सर्वसौभाग्यकरहुँ कवच परिकीर्त्तितम् ।
उक्त्वा सुरासुरोपेतमनुजान्वितसुन्दरीम् । १६
ततः परस्ताद्धृदयविदारणपद वदेत् ।
सर्वप्रहरणधरसर्वकामिकतत्परम् । १७
हनद्वयं च हृदयं बन्धनानि ततः परम् ।
आकर्षयपदद्वन्द्वं महाबलहुमस्त्रकम् । १८
त्रिभुवनेश्वरपदन्ततः सर्वजनन्ततः ।
मनासि हनयुग्मान्ते दारय द्वितयं च मे । १६
वशमानय हुँ नेत्रं ताराद्याः फट् नमोन्तकाः ।
षडङ्गमन्त्राः सन्दिष्टा नेत्रान्तास्तन्त्रवेदिभिः । २०
पुरुषोत्तम शब्द के अन्त में त्रिभुवन बोलना चाहिये । मदोन्माद
कह कर अन्त में 'हुं', हृदयं सकलं कहे 'जगत्' क्षोभण के अन्त में लक्ष्मी
दयित हुँ शिर है । मन्मथोत्तमसे सयुक्त अङ्ग के कामदायिनि हुँ शिखा
है परमोपेत सुभगाक्षर से संयुत सर्व सौभाग्य करहु कवच कीर्त्तित
किया गया है । सुरासुर से युक्त मनुज सुन्दरीम् यह कह कर इसके
आगे हृदय विदारण पद बोलना चाहिये । उसके आगे सर्व प्रहरण धर
कामिक कहे । दो हन पद हृदय है और इसके आगे बन्धनानि पद कहे ।
दो बार 'आकर्षय कहे । महाबल हुँ—यह प्रमव होता है । इससे आगे
'त्रिभुवनेश्वर' और फिर 'सर्वजन' कहे । फिर मनांसि कहकर दो बार
हन पद और दो बार दारय पद कहे । 'वशमानयहु' नेत्र है । इनके
आदि में प्रणव और अन्त में फ्ट्तथा, नमः- यह पद है । ये षडङ्ग
मन्त्र सन्दिष्ट किये हैं जो तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा नेत्रान्त कहे गये
हैं ।१२-२०।
त्रैलोक्यमोहनाणान्ते हृषीकेशपदं पुनः ।
पश्चादप्रतिरूपादि मन्मथानन्तरं वदेत् । २१