शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३३५
हुत्वा वह्नौ यथापूर्वं शिष्टान्नेन बलिं हरेत् ।
मनुना वक्ष्यमाणेन दशदिक्षु यथाविधि ॥१०८
सहद्विष्णुगणेष्योऽन्ते सर्वशान्ति पुनः ।
तेभ्यो बलि प्रगृह्णन्तु शान्तये हृदय ततः ॥१०६
ब्राह्मणान् भोजयेत् सभ्यंमधूरोत्तरमादरात् !
गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्रं भूषणसंयुतम् ॥ ११०
हन्यादयं विधिः पुंसां कृत्यारोगग्रहज्वरान् ।
रक्षःपिशाच नर्यादि क्लेशान् शीघ्रं न संशयः ॥१११
विधाय पञ्जरं मन्त्री फलकैः क्षीरशाखिनाम् ।
पञ्चगव्येन सम्पूर्य तस्मिन् साध्यं निवेशयेत् ॥११२
पूर्व की ही भाँति अग्नि में हवन करके शिष्ट अर्थात् बचे हुए अन्न
के द्वारा बलि का अपहरण करना चाहिये । आगे बताये जाने वाले मंत्र
द्वारा विधि के सहित दश दिशाओं में 'नमः पट् ट के साथ विष्णु और
गणेश के लिए तथा अन्त में सर्वशान्ति वह कर उनके लिये 'शान्ति के
लिये बलिको ग्रहण करों उनको बलि देवे और अन्त में नमः' कहे
।१०८-१०६। फिर बड़े आदर भाव से ब्राह्मणों के लिए मधुर पदार्थोंका
भोजन करावे । अपने गुरुदेव को वस्त्र और भूषण से युत दक्षिणा देनी
चाहिए ।११०। यह विधान पुरुषों के कृत्या रोग-ग्रह और ज्वर हनन
किया करता है । राक्षस-पिशाच और आर्वादि के क्लेशों का विनाश
करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१११। मन्त्र धारण करने वाला
पुरुष दूध वाले वृक्षों के तख्तों के द्वारा एक पंजरका निर्माण करे । उस
पंजर को पंच गव्य से सम्पूरित करके उसमें साध्य का निवेश कर देवे
।११२।
धौतवस्त्रं विशुद्धाङ्ग स्पृष्ट्वा सम्यग्जपेन्मनुम्
पूर्वादिदिक्षु संस्थाप्य वर्त्ति ब्राह्मणसत्तमैः १३
कारयेत्पूर्व्वसन्द्रिष्टैर्द्रव्यौर्होमं विधानविद् ।
तोषयेद्दक्षिणाभिस्तान् यजमानः स्वशक्तितः ॥११४