शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 511 में से
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अकारादिस्वरावीतं याहियाहिपदावृतम् ।
सकारं चिन्तयेच्छत्रो मूर्द्ध्न्युच्चाटमावहेत् । ८०
अनेन विधिनां शत्रु र्मण्डलामृत्युभाग्भवेत् ।
शरच्चन्द्रनिभं सार्णं सुधाधाराभिवर्षिणम् ।६०
स्मरेन्मूर्द्धनि यस्यासौ स जीवेद्विगतमयः ।
आत्मानं चक्रनाभिस्थं ध्यात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।६१
एकोऽपि रणभूमिस्थो जयत्प्रत्यर्थिनो बहून् ।
अपामार्गस्य समिधो जुहुयादृतत्वधि ।६२
रक्षो भूतपिशाचारिपीडा तस्त न जायते ।
निर्गुण्डी सर्ज्जकनकश्वेताकिंशुकसम्भवैः ।६३
समिद्धरैः कृतो होमः क्षुद्ररोगग्रहापहः ।
अपामार्गस्य समिधाः सर्पिर्मध्ये शृतश्चरुः ।६४
आज्यमेतानि जुहुयादष्टोत्तरशतं पृथक् ।
साधकाय पुनर्दद्याच्चरुं सम्पातसाधितम् ।६५
अभिचारकृता द्रोहास्तस्य नश्यन्ति सर्वथा ।
अपामार्गस्य समिधः पञ्चगव्यपरिप्लुताः ।६६
जुहुयादयुतं मंत्री दिशासु बलिमाहरेत् ।
दध्योदनेन मनुना क्षुद्ररोगदिशान्तये ।६७
अकार आदि स्वरों से आवीत और 'याहि-याहि'-इस पद से
आवृत्त सकार को शत्रु के मूर्धा में चिन्तन करे तो वह उच्चाटन का
आवाहन किया करता है ।८६। इसी विधि से करने पर शत्रु मण्डल में
मृत्यु भजने वाला हो जाता है । शरत् काल के स्वच्छ चन्द्र के सदृश
सकार वर्ण को जो सुधा धारा का अभिवर्णन करने वाला है, ऐसे का
जिस पुरुष के मस्तक में स्मरण करे वह पुरुष विगत रोग वाला होकर
जीवित रहा करता है । अपने आपको चक्र की नाभि में स्थित हुआ
ध्यान करके इस मन्त्र का जप करे तो अकेला ही रण भूमि में स्थित
होकर बहुत से शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है । अपमार्ग की