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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 511 में से

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पृष्ठ 324

३२४ ] [ श्रीशारदा तिलक
नृसिंह मन्त्र को बताया जाता है-आदि में बीज फिर 'नमोभगवते'-
यह पद, इसके बाद 'नरसिंहाय'-यह पद, पश्चात् 'ज्वाला मालिने'-
यह पद, पीछे 'दीप्तदंष्ट्रा'-यह पद, फिर, 'अग्नि नेत्राय' यह पद,
और सर्वादि में 'रक्षोघ्नाय'-यह पद बोलना चाहिए । 'सर्व भूत
विनाशांत' के अन्त में दीर्घ नकार होता है। दो बार 'पच' शब्द और
दो बार 'रक्ष' शब्द होता हैं, ध्रुव आदि में और 'हूँ फट् स्वाहा' यह
पद होना चाहिये । यह सड़सठ अक्षरों वाला ज्वालामाली महा मन्त्र
कहा गया है। इसका हृदय तेरह से बताया गया है और शिर दश से
कहा है। द्वादश वर्णों से नेत्र तथा अस्त्र करणाक्षरों से कहा है । शिखा
ग्यारह से और वर्म अठारह से बताया गया है ॥ ४१-४५।
एवमङ्गानि विन्यस्य चिन्तयेन्मन्त्रदेवताम् ॥ ४६
उज्ज्वलप्रलयानालाभमयुग्मनेत्रमनारतम् ।
भासुरं शिखिनः शिखाभिरुदग्रदंष्ट्रिमुखाम्बुजम् !
रक्षासां भयदं विकीर्णजटाकलापविभीषणम् ।
शंशचक्रकृपाणखेटकधारिणं नृहरिं भजे ॥४७
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं समाहितः ।
कपिलाज्येन जुहुयात् समिद्धे हव्यवाहने ॥४८
प्रागुक्ते पूजयेत्पीठे देवं संप्रोक्तवर्त्मना ।
कुर्वीय मन्त्रराजोक्तान् प्रयोगान्मन्तुनाऽधुना ॥४६
विशेषात् क्षुद्रभूतारिनाशनोऽयं मनुः स्मृतः ।
पाशशक्तिर्नरहरिरंकुशो वर्म फट् मनुः ।५०
षडक्षरो नरहरिः कथितः सर्वकामदः ।
ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् ।
देवता नरसिंहोऽस्य षड्बीजैरङ्गकल्पना ॥५१
इस रीति से अङ्गों का विन्यास करके मन्त्र के देवता का चिंतन
करना चाहिए । अब ध्यान बतलाया जाता है-उज्ज्वल प्रणय की
अग्नि की आभा के समान आभा वाले-निरन्तर अयुग्म नेत्र से युक्त,