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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 511 में से

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पृष्ठ 322

३२२ ] । श्रीशारदा तिलक
इसका यह प्रभाव होता है कि विजय श्री के साथ सुख पूर्वक समस्त
शत्रुओं को जीतकर राजा विजयी होता हुआ आकर ग्राम क्षेत्र धन
आदि से भली भाँति प्रसन्न होकर विभवों से मन्त्रधारी को प्रीणित
करे । यदि मन्त्रधारी सन्तुष्ट न होवे तो राजा का अनर्थ होता है ।
।३१-३२। अब यन्त्र बतलाया जाता है—साध्य से समन्वित बीज को
लिखे और आठ पत्रों में मध्य से श्रुतिशः विभाग करके मन्त्र के वर्षों
को लिखना चाहिए । बाहर लिपि से वेष्टित कर देवे । बाह्य कोणों में
गत बीज से बद्ध वसुधा गेह (भूपूर) दो से समावृत्त मन्त्र होता है। वह
यन्त्र क्षुद्र, विष—ग्रह रोग—रिपुओं के नाश करने वाला तथा श्री
का प्रदाता है । ३३।
कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं यन्त्रसयुतम् ।
अस्मिन् संस्थापयेन्मन्त्री कलशान्नव शोभनान् ३४
कषायतयोसम्पूर्णान् वस्त्ररत्नादिसंयुतान् ।
मध्ये सम्पूजयेद्दे तृसिंह शान्तविग्रहम् । ३५
तार्क्ष्यादीन्तूजयेन्मन्त्रो पूर्वादिषु यथाक्रमम् ।
इति संसाधितैस्तौयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् । ३६
अभिचारग्रहोन्मादा विनश्यन्त्यरिभिः सह ।
अभिषिक्तस्तदा विप्रान् पूजयेद्देवता धिया ३७
यथावत्पूजयेत्पश्चाद्भक्त्या गुरुमवञ्चयत् ।
राजा विजयामाप्नोति युद्धेषुः विधिनाऽमुना । ३८
नौ पदों के स्वरूप वाले मण्डल की रचना करके जो मन्त्र से
संयुत होवे । इसमें मन्त्रधारी पुरुष नौ परम शोभन कलशों की स्थापना
करे । जो कषाय जल से परिपूर्ण और नौ रत्नादि से समन्वित होवे ।
मध्य में परम शान्त शरीर वाले नृसिंह देव का इस प्रकार से पूजन
करना चाहिए ।३४-३५। मन्त्रधारी पूर्व आदि दिशाओं में क्रम के
अनुसार तार्क्ष्य आदि का अर्चन करे । इस रीति से संसाधित जलों से
प्रिय मनुष्य का अभिषिंचन करना चाहिए । ३६। अभिचार—यह—
उन्माद शत्रुओं के साथ विनष्ट हो जाया करते हैं । उस समय में