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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 511 में से

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पृष्ठ 319

चतुर्दश पटल ] [ ३१६
अब ध्यान कहा जाता है-उदीयमान करोड़ों सूर्यों के समान
प्रभा से अन्वित-किरीट और हार से समुज्ज्वल दाढ़ों के द्वारा भीषण
मुख से युक्त, कान्तियुक्त नखों और मुखों से जो दीर्घ, अनेक भुजाओंसे
युक्त है-समन्वित असुरों के स्वामी हिरण्यकशिपु को विदीर्ण करने
हुए-अग्नि और शश को धारण करने वाले सूर्य के स्वरूप वाले तीन
नेत्रों से समन्वित विद्युत से पुंज के समान जटाओं के समुदाय से
भय प्रदाता-वह्निका यजन करते हुए नृसिंह भगवान् का भजन करता
हूँ ।१३। सौम्य कार्य में इनके सौम्य स्वरूप का तथा क्रूर कर्म में इन
के क्रूर स्वरूपका सेवन करनाचाहिए। विल्व वृक्षके काष्ठोंकी समेधित
अग्नि में अथवा पत्रों से श्री पुष्पोंके द्वारा मन्त्रधारी होम करे । एक
सहस्र आहुतियों से श्रीको प्राप्ति किया करता है। प्रसूनों से अथवा
फलों से उसी भाँति दूर्वा के होम से निरोगिता को प्राप्त किया करता
है ।१४-१५। मन्त्र के द्वारा जप की हुई श्वेत वच का प्रति दिन प्रातः
काल में भक्षण करे तो मन्त्रधारी वाक् सिद्धि को प्राप्त कर लेता है
और दूसरे वाचस्पति के ही समान हो जाया करता है ।१६। जल में
परम शुभ गन्ध पुष्पादि के द्वारा देव का अभ्यर्चन करके वहाँ पर नित्य
ही अष्टोत्तर शत का होम करे ।१७।
उपसर्गा विनश्यन्ति क्षुद्रभूतज्वरादिभिः ।
दुःस्वप्ने निशि संजाते स्नात्वा मन्त्रममुं जपेत् ।१८
अनिद्रो मन्त्रवित्पश्चात्सुस्वप्नस्तस्य जायते ।
व्याघ्रचौरमृगादिभ्यो महारण्ये भयाकुले ।१९
रक्षोन्मनु रयं जप्तो भयेष्वन्येषु मन्त्रिणम् ।
अनेन मन्त्रितं भस्म विषग्रहमहाभयान् ।२०
नाशयेदचिरादेव मन्त्रस्यास्य प्रभावतः ।
घोरेऽभिचारे सोन्मादे महोत्पाते महाभये ।२१
पपेन्मंत्रं स्मरेद्देवं दुःखान्मुक्तो भवेन्नरः ।
सिंहरूपं महाभीमं नखदंष्ट्रातिभीषणम् ।२२