शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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प्राप्त किया करता है। ५२। मंत्रधारी इस प्रकार से धरा का जप
करे तो पशु-रत्न-धन आदि के साथ वह धरा का स्वामी होता है
इसमें कुछ भी विचारणा नहीं करनी चाहिए। ५३।
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चतुर्दश पटल
॥ नारसिंह प्रकरण ॥
अथाभिधास्ये विधिवन्नारसिंहं महामनुम् ।
उग्रं वीरं वदेत्पूर्वं महाविष्णुमनन्तरम् । १।
ज्वलन्तं पदमाभाष्य सर्वतोमुखमीरयेत् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं वदेत्ततः ।२
नमाम्यहमयं प्रोक्तो मन्त्रराजः सुरद्रुमः ।
ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।
देवता नरसिंहः स्यात्सुरासुरनमस्कृतः । ३
चतुर्भिर्हृदयं वर्णैः शिरस्तावद्भिरेरितम् ।
शिखाऽष्टाभिः समुद्दिष्टा षड्भिः कवचमीरितम् ।४
तावद्भिर्नयनं प्रोक्तमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः ।
शिरोललाटनेत्रेषु मुखबाह्वङ्घ्रिसन्धिषु । ५
साग्रेषु कुक्षौ हृदये गले पार्श्वद्वये पुनः ।
अपरांगे ककुदि च न्यसेद्वर्णान्यथाक्रमात् । ६
इसके अनन्तर विधि के साथ नृसिंह के महान् मंत्र राज के विषय
में बतलाऊँगा-पूर्व में-उग्र वीर-इन पदों को कहे। इसके अनन्तर
'महाविष्णु' इसको बोले । फिर 'ज्वलन्त'-इस पद को कहकर 'सर्वतो
मुख' यह कहना चाहिये । इसके उपरान्त नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु'
इन पदों को कहे। फिर 'नमाम्यहम्" यह कहे—यह मंत्रराज कह।