शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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कष्ट नहीं हो सकता । धरणि के अन्त में धरे दो वार दो ठकार अन्त में
है और आदि में ध्रुव है-यह इक्कीस-वर्णोंमें आढ्य मन्त्रहोता है । इसका
हृदय धरा कहा गया है। इसका ऋषि वराहहै और निचृद छन्द होताहै।
इसका देवता समस्त प्राणियोंको प्रकृति धरा मानी गयी है । १३७-१४१।
हृदयं त्रिभिराख्यातं चतुर्भिः शिर ईरितम् ।
त्रिभिः शिखा समुद्दिष्टा कवचं पञ्चभिर्मतम् । १४२
द्वाभ्यां नेत्रं समाख्यातं द्वाभ्यामस्त्रं पुनर्भवेत् ।
मन्त्रवर्णैः षडङ्गानि कुर्यादेवं विधानवित् । १४३
श्यामां विचित्रांऽशुकरत्नभूषणां पद्मासनां तुङ्गपयोधरोन्नताम् ।
इन्दीवरे द्वे नवशालिमञ्जरीं शुकं दधानां वसुधांभजामहे । १४४
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं धराहृदयमादरात् ।
स सर्पिषा पायसेन जुहुयात्तद्दशांशतः । १४५
तां विष्णोः पूजयेत्पीठे वक्ष्यमाणविधानतः ।
अङ्गानि पूजयेदादौ भूवह्निजलमारुतान् । १४६
दिक्पत्रेषु गमभ्यर्च्य कोणपत्रेषु तत्कलाः ।
आशापालाः पुनः पूज्या वज्राद्यसमन्विताः । १४७
तीन से हृदय कहा गया है और चार से शिर होता है । तीन से
शिखा समुद्दिष्ट की गयी है और कवच पाँच से बताया है । १४२। दो से
नेत्र और पुनः दो से अस्त्र होता है । विधान का ज्ञान रखने वाला
पुरुष इस प्रकार से मन्त्र के वर्णों के द्वारा षट् अङ्गों को करे । १४३।
अब ध्यान हैं-श्याम वर्ण से युक्त-अद्भुत वस्त्रों और रत्नोंके आभूषणोंसे
भूषित-पद्म के आसन पर विराजमान-तुङ्गपयोधरों से समुन्नत हो
इन्दीवर-नवीन शाली की मंजरी और शुक को धारण करने वाली
वसुधा का भजन करते हैं । १४४। बड़े आदर के साथ इस धरा हृदय
मन्त्र का एक लाख जप करे । जपका दशांश घृतसे संयुत पायस से होम
करना चाहिये । १४५। उस का भगवान् विष्णु के पीठ पर वक्ष्यमान
(आगे कहे जाने वाले) विधान से पूजन करे । आदिमें अङ्गों का यजन