सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

२६४ ] [ श्रीशारदा तिलक
हिमपीततमालेन्द्रनीलाभाः पीतवाससः ।
शङ्खचक्रगदाम्भोजधरा एते चतुर्भुजाः । ३०
शान्तिश्रियं सरस्वत्या रतिं कोणदलेष्विमाः ।
श्वेतकाञ्चनगोदुग्धदूर्वावर्णाः सुभूषिताः । ३१
हेतीनचैं°दलाग्रेषु शङ्खं चक्रं गदाम्बुजे ।
कोस्तुभं मुसलं खड्गं वनमालां यथाक्रमम् । ३२
रक्ताच्छपोतकनकश्यामकृष्णासिपाण्डरान् ।
बहिरग्रे समभ्यर्चेन्गरुडं कुङ्कुमप्रभम् । ३३
आवाहन करके सुगन्धित कुसुम आदि उपचारों के द्वारा देव के
अभ्यर्चन करना चाहिये । अङ्गोंका यजन करके मंत्रके वर्णों का केसरों
में अर्चन करे । २८। दलों में शक्ति समन्वित वसुदेव आदि की मूर्तियों
अर्चन करना चाहिये । वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — इन
चारों का यजन करे । हिम, पीत, तमाल और इन्द्रनील की आभा
वाले हैं—पीत वर्ण का वस्त्र धारण करने वाले—शंख, चक्र, गदा और
पद्म के धारी और चार भुजाओं से युक्त हैं ।२६-३०। कोणों के दलोंमें
शांति-श्री-सरस्वती और रति इसका यजन करे । ये चारों क्रम से
श्वेत, कांचन, गोदुग्ध और दूर्वा के वर्णों वाली है तथा समलंकृत
है ।३१। इनके आयुधों का दलों के अग्रभागों में अर्चन करे । वे आयुध
शंख, चक्र, गदा, पद्म, कौस्तुभ, मुसल, खड्ग, वन माला क्रममस्मार
हैं ।३२। रक्त, अच्छ, पोत, कनक, श्याम, कृष्ण, असित और पाण्डुर
वर्णों वाले हैं । बाहिर इनके आगे कुंकुम के प्रभा से संयुत गरुड़देव का
अभ्यर्चन करे ।३३।
मुक्तामणिक्यसंकाशौ तक्षिणोत्तरतो निधी ।
ध्वजं वरुणदिग्भागे श्यामलं पूजयेत्ततः । ३४।
अरुणं विघ्नमाग्नेय श्याममार्यं निशाचरे ।
श्यामां दुर्गीवायुकौरो सेनान्यपीतश्वरेरे । ३५