शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ ] [ श्रीशारदा तिलक
संयुत दामोदरका और पीछे विष्णुके सहित का ककुद् में विन्यास करना
चाहिए ।१७।
पुनः किरीटमन्त्रेण व्यापकं विन्यसेत्ततः ।
ब्रूयात्किरीटकेयूरहारं मकरकुण्डजम् ।१८
शंखचक्रगदाऽम्भोजहस्तं पीताम्बरं धरम् ।
श्रीवत्साङ्कियवक्षोऽन्ते स्थलशब्दमुदीरयेत् ।१६
श्रीभूमिसहितं स्वात्मज्योतिर्द्वयमुदाहृतम् ।
पश्चाद्दीप्तिकरायेति सहस्रादित्यतेजसे ।२०
नमोऽन्तः प्रणवाद्योऽयं किरीटमनुरीरितः ।
एवं न्यासन्तनो कृत्वा ध्यायेन्नारायणं परम् ।२१
उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शंखं गदां पङ्कजं ।
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमती संशोभि पार्श्वद्वयम् ।
केयूराङ्गदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभो ।
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसत्श्रीवत्सचित्हं भजे ।२२
फिर किरीट मन्त्र के द्वारा व्यापक विन्यास करे । अब उस किरीष
मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—किरीट केयूर हार और मकर
कुण्डल वाले—शंख चक्र, गदा, अम्भस्त और पीताम्बर' धर'—कहे ।
श्रीवत्साङ्कित वक्ष अन्त में स्थल शब्द को कहे । श्रीज्योति सहित
और स्वात्म ज्योतिर्द्वयं कहे । इसके पीछे दीप्ति कराया और सह-
स्रादित्य तेजस-यह बोले । इसके आदि में प्रणव है और अन्त में
'नमः-यह पद होता-यह किरीट मन्त्र कहा गया है । इस रीति
से शरीर में न्यास करने पर नारायण का न्यास करना चाहिए ।१८।
।१६-२०-२१। अब ध्यान बतलाते हैं-उदीय मान करोड़ों सूर्योंकी भामा
से अन्वित-निरन्तर शंख-गदा-पंकज और चक्र से शोभित-
दोनों पाश्वों में इन्दिरा और बसुमती से सुशोभित-केयूर, अङ्गद, हार
और कुन्डलों के भारी-पीत वस्त्र वाले कौस्तुभ से उव्दीप्त-अपने