शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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अ.त्रद, स्य अन्तिम होता है। यह भानुदेय का अभिमत का प्रदाता
आठ अक्षरों वाला मन्त्र बताया गया है। कल्याण हृदय कहा है और
ब्रह्मणे शिर कहा गया है। २७-२६।
विष्णवे स्याच्छिखा वर्म रुद्राय परिकीर्तितम् ।
अग्नयेनेत्रमाख्यातं शर्वाययास्त्रमुदीरितम् । ३०
तेजोज्वालामणिहुंफट्द्विठान्ताः पृथगीरिताः ।
अंगमन्त्रान्विन्यस्येत्पञ्च मूर्तीर्यथाक्रमम् । ३१
आदित्यं विन्यसेन्मूर्ध्नि रविं मुखगतं न्यसत् ।
हृदये भानुनामनं भास्करं गुह्यदेशतः । ३२
सूर्य चरणयोर्न्यस्येद्व्रस्वैः सद्यादिपञ्चभिः ।
प्रधानमूर्तिप्रतिमाःसर्वाभरणभूषिताः । ३३
मूर्द्धास्यकण्ठहृदयकुक्षिनाभिध्वजाङ्घ्रिषु ।
मन्त्रवर्णान् न्यसेक्यो प्रत्येकं प्रणवादिकान् । ३४
विष्णवे - यह शिखा है, रुद्राय - वह वर्म कीर्तित किया गया है।
अन्नेये नेत्र कहा है और शर्वाय अस्त्र होता है। दो ठकार और स्वाहा
है, तेजो ज्वाला मणिहूँ फट् - यह होता है। फिर अङ्ग मन्त्रोंका न्यास
करना चाहिये और यथा क्रम पाँच मूर्तियों का करे । ३०-३१। आदित्य
का मूर्धा में विन्यास करे और रवि का मुख में न्यास करे। हृदम में
भानु का और भास्कर का गुह्य देश में न्यास करना चाहिये । ३२। सूर्य,
का चरणों में सद्यादि पाच व्याहृतियोंहैके साथ न्यास करे। प्रधान
मूर्ति की प्रतिमायें सग आभरणों से भूषित हों । ३३। मूर्धा, मुख, कण्ठ
हृदय, कुक्षि, नाभि, ध्वज और चरणोंमें प्रणव जिसके आदिमें होवे ऐसे
प्रत्येक मन्त्र के वर्णों का न्यास करना चाहिए। ३३-३४।
एवं न्यस्यशरीरोऽसौ चिन्तयेत्तेजसांनिधिम् । ३५
रक्ताब्जयुग्माऽभयदानहस्तं केयूरहारांगदभूषणाढ्यम् ।
मणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्ति विलसत्त्रिनेत्रम् । ३६