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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 511 में से

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पृष्ठ 257

एकादश पटल } { २५६
अनन्तर भूतपतिं सेनान्यं गुहसंज्ञकम् ।
हेमशूलं विशालाक्षं शक्तिशूलकरान् यजेत् १२७
दिग्दलाग्रेषु पूर्बादि देवसेनापतिं पुनः ।
विद्यां मेधां ततो वज्रं कोणस्थान् शक्तिकुक्कुटौ १२८
मयूरं द्वीपमध्यचैद्वाह्ये लोकेश्वरान्पुनः ।
अस्त्राणि तेषामते स्युः सुब्रह्मण्यार्चनेरिता १२६
स्वादुभिर्भक्ष्यभोज्याद्यैः षष्ठ्यां संप्रीणयेद्विभुम् ।
पूजयेद्देवताबुद्ध्या कुमारब्रह्मचारिणः ।१३०
सतानं विजयं वीर्यरक्षामायुः श्रियं यशः ।
प्रदद्यात्साधकस्याशु सुब्रह्मण्यः सुरार्चितः १३१।
जपतर्पणपूजादौ विघ्नेश सर्वसिद्धिदम् ।
प्रीणयेदनया स्तुत्या प्राप्तये सर्वसम्पदाम् ।१३२
ॐ रूमामाद्यं प्रवदन्ति सन्तोवाचः श्रुतौ यामभियं गृणन्ति ।
गजाननं देवगणानताङ्घ्रि भजेऽहपद्धेन्दुकृतोवतसम् ।१३३
जयन्त-अग्नि वैश्य-कृत्तिका पुत्र-भूतपति-सेनान्य-गुह-
हेम शूल-विशालाक्ष ओर शक्ति तथा त्रिशूल करों में रखने वालों का
यजन करना चाहिये । १२७। दिग्दलों के पूर्व अग्र भागों में पूर्बादि देव
सेनापति का यजन करे - विद्या-मेधा-वज्र और कोणों में स्थितों का-
शक्ति और कुक्कुटों का, मयूर, द्वीप का अर्चन करना चाहिये फिर
बाहिर में लोकेश्वरों का तथा उनके अन्त में अस्त्रों का अर्चन सुब्रह्मण्य
के यजन में कहा गया है ।१२८-१२६। परम स्वादु भक्ष्य भोज्यों
के द्वारा षष्ठी में विभु को प्रीणित करना चाहिए । देवता की बुद्धि से
कुमार ब्रह्मचारियों का पूजन करना चाहिये ।१३०। सुरों के द्वारा
समर्चन किये हुये सुब्रह्मण्य देव साधना करने वाले व्यक्तियों को
शीघ्र ही सन्तति -विजय -दीर्घ - रक्षा -आयु -श्री-यश को
देते हैं ।१३१। जप, तर्पण और पूजा आदि में समस्त सिद्धियों के
प्रदाता विघ्नेश को प्रीणित करे । इस स्तुति के द्वारा उनको प्रसन्न करे