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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

एकादश पटल ] [ २५३
इभवक्त्रं चैकदन्तं लम्बोदरमनन्तरम् ।
पत्राग्रेष्वर्चयेत्पश्चाद्ब्राह्म्याद्यास्तदनन्तरम् । ६६
मधु से युक्त लवणों से हवन करके अनिता जनों को वश में कर
लिया करता है । अब क्षिप्रप्रसादन के मन्त्र से बतलाया जाता है ।
सम्वर्त्तक-क्षकार, नेत्र-इकार से युत, पार्श्व-पकार, वह्निवासन-
रेफसम, स्वबीजाद्य - गं । इस बीज के आदि वाला प्रसादन के लिये
हृन्मन्त्र दश अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि गणक है-विराट्
छन्द है और क्षिप्रप्रसादन है विघ्न इसका देवता बताया गया है । दीर्घ
युक्त बीज के द्वारा षट् अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये । ६२-६४।
अब ध्यान बताया जाता है-पाश - अंकुश-कल्पलता-विषाण को
धारण करते हुए अपनी सूँड से बीजपुर को आहित करने वाले-रक्त
वर्ण से युक्त-तीन नेत्रों से समन्वित-तरुण चन्द्र को मस्तक में धारण
करने वाले-हार से समुज्ज्वल-हाथी के समान मुख वाले आपकी रक्षा
करे ।६४। इन मन्त्र का एक लाख जप करे और जप का दशांश
भाग दश हजार तिलों से हवन करना चाहिये । त्रिमधुर द्रव्यों से
अथवा कथित आठ द्रव्यों से होम करे ।६५-६६। एकाक्षरोदित पीठपर
वक्ष्यमाण मार्ग के द्वारा गन्ध पुष्पादि से और धूप-दीपों से गजानन
प्रभु का यजन करना चाहिए ।६७। पूर्व में अङ्गों का पूजन करके फिर
आठ विघ्नों का अभ्यर्चन करे । उन आठों के नामों का परिगणन
किया जाता है-विघ्न, विनायक, शूर, वीर, वरद, इभवक्त्र, एकदन्त,
लम्बोदर ये आठ हैं । पीछे पत्रों के अग्र भागों में ब्रह्माणी आदिक का
अर्चन करना चाहिए ।६६।
लोकपालास्तदस्त्राणि विघ्नपूजासमीरिता ।
आज्यान्नैर्जुहुयान्नित्यमन्वन्वाक्वत्सराद्भवेत् । १००
पायसान्नेन महती श्रियमाप्नोति मानवः ।
आज्यहोमेन वशयेत्प्राणिनः सकलान्सुधीः ।१०१