शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश पटल ] [ २४६
सिन्दूर के तुल्य मुख से युक्त-तीन नयनों वाले करकमलों में पाश
और अंकुश को धारण किये हुए हैं-मधु से संयुक्त कपाल निरन्तर
विद्यमान है-अर्ध चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले पुष्टि के द्वारा
आलिंगित शरीर से संयुत हैं। जो ध्वज के अग्रभाग को करमें लिए हुए
हैं और हस्त में पद्म धारण किए हुए हैं जिससे यह परम शोभित है।
उसकी योनि में कर को आहित कर रक्खा है और वसुयुक्त पात्र को
सूंड में ग्रहण कर सुशोभित हैं ।७१। इस मन्त्र का चार लाख जप करे
और जप के दशांश का होम किया करे। यह होम तीनों मधुरों से अक्त
पूर्व में कहे हुए आठ द्रव्यों के द्वारा करनी चाहिए। पूर्व में वर्णित पीठ
पर यजन करे जिसमें तीव्रा आदि नौ शक्तियां होवे। मंत्र से मूर्ति
की भली भांति कल्पना करके उसमें आवाहन करके विभु का अभ्यर्चन
करना चाहिए ।७२-७३। मिथुना वृत्ति आद्या होती है-दिगम्बर आमो-
दादि से द्वितीया होती है। अङ्गों से तृतीया होती है-मातृगणों से
चतुर्थी होती है ।७४। लोकपालों से पांचवीं और वज्राद से छठवीं होती
है। इस प्रकार सिद्ध मन्त्र होता है। मंत्रधारी खिले हुये कमलों के
द्वारा होम करे तो सब वश में आ जाते हैं। तिलों से मिश्रित तण्डुलों
से हवनने करने से श्री की प्राप्ति किया करता है। आज्य में लोलित
मोदकों से होमकरके विजय पाता है। जो पार्थिव युद्ध भूमिमें गया हुआ
होवे, वह मधुरों से किया हुआ हवन पार्थिवों को वश में कर लेता
है ।७५-७७।
भक्ष्यभोज्यादिकं सर्वं हुत्वा भीष्टानि साधयेत् ।
शक्तिरुच्चं निजं बीजं महागणपति वदेत् ।७८
ङेऽन्तमग्निवधूः प्रोक्तो मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः ।
गणकः स्यादृषिश्छन्दो गायत्री निचृदादिका ।७६
उदिता देवता तन्त्रे नाम्ना शक्तिगणाधिपः।
व्यस्तैः समस्तैर्मन्त्रस्य पदैरङ्गानि कल्पयेत् ।८०
मुक्तागौरं मदगजमुखं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं ।