शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश पटल ] [ २३७
को बतलाया जायगा जिनको प्राप्त करके मानव नित्य मनोरथों का
साधन किया करते हैं ।१। पंचात्मक, गकार, जो शशिवर अर्थात्-विन्दु
युक्त हो वही गणपति का बीज होता है, उसका मुनि गणक है-छन्द
निविद् है और इसका विघ्न देवता होता है। यह दीर्घ भाक् बीज से
मन्त्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए। अब ध्यान बतलाते हैं-गणपति
सिन्दूर की आभा से युक्त है-तीन नेत्रों वाले हैं-इनका उदर बहुत
बड़ा है —यह हस्त कमलों में दन्त, पाश, अंकुश और वरदानको धारण
करने वाले हैं-उरुकर में बीजपुर से सुन्दर शोभित है, भालचन्द्र, से
मस्तक द्युतिमान् है-गज के समान मुख से संयुत है तथा दान से पूर्ण
और आर्द्र गण्ड स्थल वाले हैं-मोतियों से आबद्ध भूषा वाले हैं ऐसे
रक्त वस्त्राँग राग वाले गणपति का भजन करो ।२-३-४। इस मन्त्र
का चार लाख जप करे और उसका दृशांश मोदक-पृथुक-लाजासक्तु
और ईख के पर्वों से तथा नारियल शुद्ध तिल और पके कदली फलों
से हवन करे । ये आठ द्रव्य ही मनीषियों ने विघ्नेश्वर के कहे हैं
।५। तीव्र शक्तियों से युक्त पीठ पर विघ्नेश्वर का यजन करना
चाहिए। शक्तियों के नामों का परिगणन करके उन्हें बतलाया जाता
है-तीव्रज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी ।७।
उग्रा तेजोवती सत्या नवमी विघ्ननाशिनी ।
सर्वादिशक्तिकमलासनाय हृदयावधिः ।८
पीठमन्त्रोऽयनेतेन प्रदद्यादासनं विभोः ।
मूलेन मूर्तिं संकल्प्य तस्यां विघ्नेश्वरं यजेत् ।६।
कर्णिकायां चतुर्दिक्षु प्रथमं पूजयेदिमान् ।
गणाधिपं गणेशानं तृतीयं गणनायकम् ।१०
गणक्रीड पीमगौररक्तनीलरुचः क्रमात् ।
सर्वांन्नागेन्द्रभूषाढ्यान्भक्ष्यलक्षितपुष्करान् ।११
यथापूर्वं ततोभ्यर्चेत्केसरेष्वङ्गदेवताः ।
पत्रमध्येपु विधिवद्वक्रतुण्डादिकान्यजेत् ।१२