शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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दुःखों का विनाश करने वाली है ।६६। पादों की अष्ट सन्धियों में, गुदा
लिङ्गाधार, उदर में, पार्श्व, हृदय, स्तन, कण्ठ, में पुन वहिनष्ट संधियों
में मुख, नासिका, कपोल, आंख, कान भौंहों का मध्य भाग मूर्धा में
मन्त्र के अक्षरों का विन्यास करे जो देवता के भाव को सिद्धि के लिये
करना चाहिये ।६७-६८। छै, चार, आठ और छै इन्द्रिया मन्त्र के
वर्णों से जो जाति युक्त हो क्रमानुसार अंगक्लृप्ति होती है ।६६।
ध्यान बतलाया जाता है-सौवर्ण कमल के मध्य में विराजमान,
तीन नेत्रों से समन्वित, विद्युल्लता के तुल्य, करकमलों से शंख, चक्र,
वरदान और अभयदान को धारण करतो हुई--मस्तक में चन्द्रमा की
कला को वहन करने वाली, ग्रैवेय, अंगद, हार, कुण्डलो को धारण
करती हुई-इन्द्रादि देवगणों के द्वारा स्तवन की हुई-जिसके समीप में
सिंहस्थित है--ऐसी चन्द्रमुखी विन्ध्य वासिनी देवी का ध्यान करना
चाहिए ।७०-७१।
एव ध्यात्वा जपेल्लक्षाचतुष्क तद्दशांशतः ।
जुहुयाद्धविषा मत्री शालिभिः सर्पिषा तिलै ।७२
प्रागीरिते जपेत्पीठे देवीमङ्गदिभिः सह ।
अङ्गपूजा यथापूर्वं दलमूलेष्वमा यजेत् ।७३
आर्या दुर्गा च भद्राख्या भद्रकाली ततोऽम्बिका ।
क्षेमान्या वेदगर्भाख्या क्षेमङ्कर्य्यष्टशक्तयः ।७४
अस्त्राणि पत्रमध्येषु शंखचक्रासिखेटकान् ।
बाणकोदण्डशूलानि कपालान्तानि पूजयेत् ।७५
ब्राह्मयाद्याः स्युर्द्दलाग्रेषु लोकपालास्ततः परम् ।
सिद्धमन्त्रः प्रयोगेषु देवीमित्य विचिन्तयेत् ।७६
कालपावकसन्निभां कलिताद्धेचन्द्रशिरोरुहाम् ।
भालनेत्रविभूषणां भयदायिसिंह निषेदुषीम् ।
चक्रशंखकृपाणखेटकचापबाणरोटिकां,
शूलवाहिभुजां भजे विजिताखिलासुरसैनिकाम् ।७७