शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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मरण को प्राप्त कर लेता है। देवी का ध्यान करके क्षुद्रादि—चोर—
भूत आदि का विनाश कर दिया करता है ।३४। अब जय दुर्गा का
मन्त्र बतलाते हैं प्रणव, दो बार दुर्गे पद, रेफ, अन्त में क्षकार, ईकार
के सहित णकार और अन्त में दो ठकार—यह दश अक्षरों वाली जय
दुर्गा जान लेनी चाहिए ।३५।
तारादिदुर्गे हृदयं दुर्गे शिर उदाहृतम् ।
दुर्गायै स्याच्छिखा वर्म भूतरक्षिणि कीर्तितम् ।
तारादिदुर्गे युगलं रक्षिण्यस्त्रं समीरितम् ।३६
कालाभ्र भां कटाक्षं ररिकुलभयदां मौलिबद्धे दुरेखां
शङ्खञ्चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपिकरैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ।३७
बाणलक्षं जपेन्मन्त्रं घृतेन जुहुयात्ततः ।
दशांशं संस्कृते वह्नौ ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३८
लष्टाक्षारोपिते पीठे पूजयेत्पर्ववत्सुधीः ।
मन्त्रं जपन् विशेद्युद्धे शत्रून्हन्याद्विशेषतः ।३६
प्रजपेद्व्यवहारादौ तत्रापि विजयी भवेत् ।
अर्चयेदस्त्रशस्त्राणि जयार्थी विद्ययाऽनया ।४०
ज्वलज्वलपदान्ते स्याच्छूलिनीति पदं वदेत् ।
दुष्टग्रहं हुमस्त्रान्तो वह्निजायावधिर्मनुः ।४१
भूतेन्द्रियाक्षरैः प्रोक्तो ग्रहक्षुद्रारिनाशकः ।
ऋषिर्दीर्घतमाः प्रोक्तः ककुप्छन्द उदाहृतम् ।४२
तारादि दुर्गे—यह हृदय है और दुर्गे—यह शिर कहा गया है।
दुर्गायै-यह शिखा है—भूत रक्षिणि—यह वर्म कहा गया है ।३६। तारादि
दुर्गे युगल और रक्षिणि—यह अस्त्र कहा गया है ।३६। अब ध्यान बताया
जाता है—काले मेघ की आभा वाली—अपने कटाक्षों के द्वारा शत्रुओं
के समुदाय को भय प्रदान करने वाली—मस्तक में इन्दु रेखा को धारण