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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 511 में से

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श्री शारदा तिलक ] १७
अगाध हैं। भूख और पिपासा प्राण के-शोक और मोहमन के-जरा और
मृत्यु शरीर की-ये छँ ऊर्मियाँ कही गयी हैं । स्नायु-मज्जा और अस्थि
शुक्रसे त्वक्-मांस शोणित से-वह देहधारियोंके देहों में षाट्कौशिककहा
गया है । इस प्रकारसे स्थित यह गर्भमें आता है और उस समयमेंअपने
पूर्व जन्म में किये हुए शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता है । यह बहुत
ही दुःखित रहतेहुये स्थित रहता है, इसकासब शरीर जरायुसे ढकाहुआ
होता है । काल स क्रमसे वह शिशु अपनी माता को क्लेशित करताहुआ
भी गर्भ में रहता है । उसका शरीर पिण्डित रहता है और वह नीचेकी
ओर मुख वाला जन्म लिया करता है । क्षण में ही यह विस्मृति वाला-
निश्चेष्ठ होता हुआ अपने रुदन करनेकी इच्छा किया करता है।६ ५०।
ततश्चैतन्यरूपा सा सर्वगा विश्वरूपिणी ।
शिवसन्निधिमासाद्य नित्यानन्दगुणोदया ॥५१
दिक्कालाद्यनवच्छिन्ना सर्वदेहानु (वेदार्थ) गा शुभा ।
परापरविभागेन पराशक्तिरियं स्मृता ॥५२
योगिनां हृदयाऽम्भोजे नृत्यन्ती नित्यमञ्जुला ।
आधारे सर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युदाकृति ॥५३
शंखवर्त्तक्रमाद्देवी सर्वमावृत्य तिष्ठति ।
कुण्डलीभूतसर्पाणामङ्गश्रियमुपेयुषी ॥५४
सर्वदेवमयी देवी सर्वमन्त्र (वर्ण) मयी शिवा ।
सर्वतत्त्वमयी साक्षात् सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा विभुः ॥५५
इसके अनन्तर वह चैतन्यरूप वाली-सबमें स्थित-विश्व रूपिणी-
शिव के सान्निध्य को प्राप्त करके नित्यानन्द गुणों के उदययुता-दिशा
और काल आदि से अनवच्छिन्ना-सबके देहों में अनुगमन करने वाली
शुभा पर और अपर के विभागसे यह पराशक्ति कहीं गयी है ।५१-५२।
योगियों के हृदय कमल में नित्य ही सहसा नृत्य करती हुई-समस्त
प्राणियों के आधार में विद्युत की आकृति वाली यह स्फुरण करती
हुई ।५३। शंख के आवर्त के क्रम से यह देवी सबकी आवृत्त करके
स्थित रहा करती है । यह कुण्डलीभूत सर्पों की अङ्गश्री को प्राप्त होने