सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

१६ ] [ प्रथम पटल
और महतत्व ये आठ हैं। तन्मात्राएँ-महान् अहङ्कार के सहित सात
विकृतियाँ हैं ऐसा तत्वों के ज्ञाता कहते हैं। ३८-३६। यह देह अग्नि
और सोम के स्वरूप वाला होता है क्योंकि बिन्दु उभयात्मक ही होता
है। दाहिना अंश सूर्य कहा गया है और वाँया भाग सोम होता है।
दश नाड़ियाँ होती है उनमें भी तीन नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं-शरीर
के मध्य में नवाभाग में इडा नाड़ी है। दूसरी सुषुम्ना और पिङ्गला है।
उनमें भी मध्य में रहने वाली नाड़ी अग्नि और सोम के स्वरूप वाली
होती है। गान्धारी-हस्तिजिह्वा-सुपूषा-अलम्बुषा-यशस्वनी-शंखिनी
और कुहू ये सात नाड़ियाँ होती हैं। इन से अनन्त नाड़ियाँ समुत्पन्न
हुई हैं। सुषुम्णा पाँच पर्वों में से सब में सब ओर बलवान् प्राण वायु है
जो मूलाधार से उद्गत होता है और उसके शरीर में व्याप्त रहता है।
इसमें दश वायु कही गयी हैं और वह्नियां भी दश हैं।४०-४४। प्राण-
अपान-उदान-ज्ञान और समान ये पाँच हैं और नाग-कूर्म-धनञ्जय-
कृकल और देवदत्त ये पाँच इनके नाम कहे गये हैं।४५।
अग्नयो दोषदूष्येषु संलीना दश देहिनः ।
बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य, मनसः स्मृतौ ।४६
शोकमोहौ, शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः ।
स्वाय्वस्थिमज्जानः शुक्रात् त्वङ् मांसास्रोणि शोणितात् ।४७
षाट्कौशिकमिद प्रोक्तं सर्वदेहेषु देहिनाम् ।
इत्थभूतस्तदा गर्भे पूर्वजन्मशुभाशुभम् ।४८
स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा च्छन्नदेहो जरायुजा।
कालक्रमेण स शिशुर्मातरं क्लेशयन्नपि ।४६
स पिण्डितशरीरोऽथ जायतेऽयमवाङ्मुखः ।
क्षणन्मिषते निश्चेष्टी मीत्या रोदितु (दन) मिच्छति ।५०
देहधारियों के दोष दूष्यों में दश अग्नियां संलीन रहती हैं। उनके
नाम ये हैं-कल्माष-कुसुम-दहन-शोषण-महाबल-पीडर-पतङ्ग-स्वर्ण-