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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 511 में से

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पृष्ठ 198

१६८ ] [ श्री शारदा तिलक
इन्द्र कोण में शोभित दण्ड-कुण्डिका अक्ष अभय वाली गायत्री का मंत्र-
धारी पूजन करे और उसी प्रकार वाले ब्रह्माजी का भी यजन करना
चाहिए । राक्षस कोण में शंख—चक्र गदा और पद्म के धारण करने
वाली पीतवस्त्र से संयुत सावित्री का अर्चन करे और उसी प्रकार से
विष्णु का यजन करे । वायुकोण में परशु—अक्षमाला—अभय और
वरदान से युक्त सरस्वती का अर्चन करे और इसी प्रकार से उसी तरह
के लक्षणों वाले रुद्र का भी यजन करना चाहिये । अग्निकोण में मणि-
करण्डक रत्न—कुम्भ का अर्चन करे । वरों से धारण किये हुए पीत-
तुन्दिल धन नाथक को सव्यहस्त से आलिंगन करके वाम हस्त से धनद
के अङ्क में समारूढ़ अम्बुजधारिणी महालक्ष्मी का अभ्यर्चन करना
चाहिये । वारुण में मदन, बाण, पाश, अंकुश, शरासन को धारण करते
हुए जया के समान रक्त रत्न भूषण धारिणी का पूजन करे । २२-२८।
पाणिना, रमणाङ्कस्थां रतिं सम्यक् समर्चयेत् ।
ऐशाने पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् ।२९
सृणिपाशधरं कान्तावराङ्गस्पृक्करांगुलिम् ।
माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगम्बरं ।३०
पुष्करे विलसद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् ।
सिन्दूरसदृशाकारांमुद्दाममदविभ्रमाम् ।३१
धृतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशम् ।
आश्लिष्टकान्तामरुणां पुष्टिसंज्ञैर्दिगम्बराम् ।३२
कर्णिकायां, निधी पूज्यौ षट्कोणोभयपार्श्वयोः ।
अङ्गानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् ।३३
अनङ्गाकुसुमा पश्चादनंगकुसुमातुरा ।
अनंगमदना पश्चादनंगमदनातुरा ।३४
भुवनपाला गगन—वेगा चैग ततः परम् ।
शशिरेखाथ गगन-रेखा चैवाष्टशक्तयः ।३५
पाणि से रमण की गोद में संस्थिता रति का भली भाँति पूजन