सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 193

अष्टम पटल } [ १६३
होकर अशन करे और सर्वदा मुसकान के साथ प्रिय भाषण करना
चाहिए ।१५५।१५६।
पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यै रात्मानं नियतः शुचिः ।
शयीत शुद्धशय्यायां तरुण्या सह नान्यया ।१६२
नग्नोनावतरेदम्भस्नैतैलाभ्यक्तोन भक्षयेत् ।
हरिद्रां न मुखेलिम्पेन्नस्वपेदशुचिः क्वचित् ।१६३
न वृथा विलिखेद्भूमिं न बिल्वं द्रोणमम्बुजम् ।
धारयेन्मूर्द्धनि नैवाद्याल्लवणं तैलं च केवलम् ।१६४
मलिनो न भवेज्जातु कुत्सितान्नं न भक्षयेत् ।
द्रोणपंकजविल्वानि पद्भयां जातु न लंघयेत् ।१६५
सहदेवीमिन्द्रवल्लीं श्रीवल्लीविष्णुवल्लभाम् ।
इत्याचारपरो नित्यंविष्णुभक्तो दुर्लभाम् ।१६६
श्रियमाप्नोति महतीं देवाना मपि दुर्लभाम् ।१६७
नियत और शुचि होकर गन्ध-पुष्पादिक के द्वारा आत्मा का पूजन
करे । शुद्ध शैया में शयन करे और अन्य तरुणी के साथ कभी भी शयन
न करे । १६२। नग्न होकर जल में अवतरण न करे और तेल से अभ्यक्त
होकर भक्षण नहीं करना चाहिए । हरिद्रा को कभी मुख पर लेपन न
करे और अशुचि रहकर कहीं पर भी शयन नहीं करना चाहिए । भूमि
में वृथा न लिखे—बिल्व—द्रोण—अम्बुज को मस्तक में धारण न करे
और केवल लवण और तेल का अशन नहीं करना चाहिए । कभी
मलिन न होवे तथा कुत्सित अन्न का भक्षण न करे । द्रोण—पंकज
और विल्व को पैरों से कभी नहीं लांघना चाहिए । १६३।१६५। सह
देवी—इन्द्रवल्ली—श्री वल्ली—विष्णु वल्लभा—कन्या—अम्बुज—
और प्रवाल को सदा मस्तक पर धारण करे । १६६। इस प्रकार के
आचार में परायण—विष्णु भगवान का भक्त और दृढ़ व्रत पुरुष बहुत
बड़ी श्री को प्राप्त किया करता है जो कि देवों को भी दुर्लभ होती है ।
।१६७।