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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 511 में से

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पृष्ठ 190

१६० ] [ श्री शारदा तिलक
उसके बाहिर ककार आदि का व्यंजन होवे । सोलह दलों में स्वर होवे-
अन्त में वषट् होवे और धरा बिम्बों से वेष्टित करे—ऐसा ही यन्त्र
लिखना चाहिए । भूपुर से दोनों कोणों में ह और क्ष वार-वार लिखे-
यही महालक्ष्मी का यन्त्र होता है जो सब ऐश्वर्यों के फल का प्रदान
करने वाला है । यह सब दुःखों का शमन करने वाला और सभी आप-
दाओं का निवारण करने वाला होता है । इसके विषय में बहुत अधिक
क्या कहा जावे—इतना ही पर्याप्त है कि इसके समान अन्य कोई भी
यन्त्र ही नहीं है । अब अन्य मन्त्र बतलाते हुए उसका उद्धार कहते
हैं—माया बीज श्रीबीज से पुटित होवे—ककार, तकार और एकार
से युक्त लकार, ककार और मकार और लकार दीर्घ युक्त होवे—इकार
और मरुत एकार से युक्त हो । दो बार प्रसीद पद होवे । पुनः भुवने-
श्वरी श्री होवे । महालक्ष्मी के अन्त में नमः यह पद दो और आदि
में प्रणव हो—यही मन्त्र होता है—यह सत्ताईस अक्षरों से युक्त होता
है जो सभी समृद्धियों का प्रदाता है—ऐसा कहा गया है । हृदय कमल
में कहा गया है और शिर कमलालये में बताया गया है—प्रसीद शिखा
हैं उसी के चार अक्षरों का कवच बताया गया है । पृथक् तीन बीजों से
पुटित इन पदों से अस्त्र करना चाहिए ।१४१।१४७।
सिन्दूरारुणकान्तिमब्जवसतिं सौन्दर्यवारि निधिम् ।
कोटीराङ्गदहारकुण्डल कटीसूत्रादिभिर्भूषिताम् ।
हस्ताब्जैर्वसुपत्रमब्जयुगलादर्शी वहन्तीं परा-
भावीतां परिचारिकाभिरनिशं ध्यायेत्प्रियां शार्ङ्गिणः ।१४८
लक्षं जपेत्फलैर्बिल्वैर्जुहुयान्मनुरोक्षितैः ।
दशांशं संस्कृते वह्नौ प्राक् प्रोक्तं नैव वर्त्मना। १४६
श्रीबीजोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।
अङ्गावृत्तेर्बहिः पूज्या मूर्त्तयः श्रीधरादया ।१५०
श्रीधराख्यं हृषीकेशं बैकुण्ठं विश्वरूपकम् ।
वासुदेवं सङ्कर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ।१५१