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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 511 में से

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पृष्ठ 180

१८० ] [ श्री शारदा तिलक
वारिवाहों (मेघों) से विनिर्मुक्त मोतियों की लड़ी से महान्, उत्तरा-
सङ्ग वहन करती हुई, वस्त्रों से परिकल्पित, तपे हुए सुवर्ण से सन्नद्ध
वैदूर्य (मणिविशेष) से निर्मित, अगदों (बाजूवन्द) के भूषण से समन्वित
।७७।७८। पद्मराग मणि के समान स्फुरण करने वाले वर्ण से युक्त
कंकणों से संयुत कर कमलों वाली ।७६। माणिक्य (लाल रङ्ग का रत्न
विशेष) के खण्ड से आवद्ध अंगूठी से विभूषित, तपे सुवर्ण से क्लृप्त
माला तथा धैय्य से सुशोभायमान, माला और विचित्र कम्बु से सदृश
कन्धरों वाली, उदीयमान सूर्य के आकार वाली मणि से युक्त, ताटङ्क
(तरकी, कान का भूषण) से विभूषित, रत्नों से अंकित शोभित सुवर्ण
के कर्णपुरों से उपशोभित, जपा के पुष्प तथा विद्रुम के सदृश लावण्य
से ललित अधरपल्लवों वाली, अनार के बीजों की आभा से संयुत दांतों
की पंक्ति से शोभायमान्, कलंक की कालिमा से रहित शरत्कालीन चन्द्र
के सदृश आनन वाली कमल के दल के आकार वाले तीन नेत्रों से परम
सुन्दरी-भृकुटियों के द्वारा जीत लिया है कामदेव के धनुष का विभ्रम
जिन्होंने ऐसी भौंहों वाली महालक्ष्मी देवी का चिन्तन करे ।८०।८४।
विलसत्तिलपुष्पश्रीविजयोद्यतनासिकाम् ।
ललाटकान्तिविथविजिताद्र्धंसुधाकराम् ।८५
सान्द्रसौरभसम्पन्नकस्तूरीतिलकाङ्किताम् ।
मत्तालिमालाविलसदलकाढ्यमुखाम्बुजाम् ।८६
पारिजातप्रसूनश्रीवाह्निधम्मिल्लबन्धनाम् ।
अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटाङ्कितमस्तकाम् ।८७
सर्वलावण्यसति भवनं विभ्रमश्रियः ।
तेजसां जन्मभूमिं तां महालक्ष्मी मनोहराम् ।८८
एवं सञ्चत्य यो देवीं हविष्याशी जितेन्द्रियः ।
भानुलक्षं जपेन्मन्त्र दशांशं जुहुयाद् घृतैः ।८६
जुहुयाच्छ्रीफलैः पद्मैः प्रत्येकमयुतं ततः ।
तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैः सुगन्धैरयुत द्वयम् ।६०