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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 511 में से

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पृष्ठ 175

अष्टम पटल ] [ १७५
मूर्धादिवक्षोगुह्या ङ्घ्रो पञ्चबीजानि विन्यसेत् ।
शेषान्यसेत्सप्तवर्णान् हृदये सप्तधातुषु ।५०
अङ्गानि पञ्चभिर्बीजैरस्त्रं शिष्टाक्षरैर्भवेत् ।
ज्ञानैश्वर्यादिभिर्युक्तैश्चतुर्थ्यन्तैः सजातिभिः ।५१
ज्ञानमैश्वर्यशक्ती च बलवीर्ये सतेजसा ।
ज्ञानैश्वर्यादयः प्रोक्ताः षट्क्रमादंगदेवताः ।५२
एवं न्यस्तशरीरोऽसौ स्मरेदुद्यानमुत्तमम् ।
चम्पकाशोकपुन्नागपाटलैरुपशोभितम् ।५३
लवंगमालतीबिल्वदेवदारुनमेरुभिः ।
मंदारपारिजाताद्यैः कल्पवृक्षैः सुपुष्पितैः ।। ५४
चन्दनैः कर्णिकारैश्च मातुलिंगैश्च वञ्जुलैः ।
दाडिमीलकुचांकोलैः पूगैः कुरवकैरपि ।५५
कदलीकुंदमंदारनालिकेरैरलङ्कृतैः ।
अन्यैः सुगंधिपुष्पाद्यैर्वृक्षसंघश्च मण्डितम् ।५६
मूर्धा के आदि में—वक्ष—गुह्य और दोनों चरणों में पाँच बीजों
का न्यास करे । शेष सात वर्णों को हृदय में न्यास करे । पाँच बीजों से
अङ्गों को सप्तधातुओं में न्यास करे और निरन्तर शिष्टाक्षरों द्वारा
होवें। ज्ञान ऐश्वर्य आदि से युक्त—सजाति और जिसके अन्त में
चतुर्थी विभक्ति हो । ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य तेजके सहित होवे
ये क्रम से ज्ञानैश्वर्यादिक अङ्ग देवता कहे गये हैं ।५०।५१।५२। इस
रीति से जिसने शरीर में न्यास कर लिया है वह एक उत्तम उद्यान का
स्मरण करे जो उद्यान चम्पक—अशोक पुन्नाग और पाटल से उप
शोभित होवे ।५३। जो लवंग, मालती, विल्व, देवदारु, नमेरु, मन्दार
पारिजात आदि कल्प वृक्षों से शोभा सम्पन्न होवे, जिन वृक्षों में सुन्दर
पुष्प भी होवें । चन्दन, कर्णिकार, मातुलिंग, वञ्जुल, दाड़िम, लकुच,
कङ्कोल, पूग, कुरवक, कदली, कुन्द, मन्दार, नारियल से अलंकृत
होवे—ऐसे ही अन्य सुगन्धित पुष्पादि से तथा वृक्षों के समुदायों से
मण्डित होवे ।५४।५५।५६ ।