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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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१२ ] [ प्रथम पटल
भूतादिकादहङ्कारात्पञ्च भूतानि जज्ञिरे ।
शब्दात्पूर्वं वितत्स्पर्शाद्वायूरूपादधुताशनः ।२०
उन सदाशिव से ईश होते हैं और फिर उनसे रुद्र का समुद्भव
हुआ करता है। उनसे भगवान् विष्णु होते हैं और फिर ब्रह्मा होते हैं ।
इनका इसी रीति से समुद्भव हुआ करता है । १६ । फिर मूलभूत
अव्यक्त जो पर भूत है विक्रत से गुणान्तःकारण स्वरूप वाला महत्तत्व
हुआ था । उस महत्तत्व से विधि भेद से तीन गुणो वाला अर्थात् सत्व-
रजः — तमोगुणों वाला अहंकार हुआ था । वैकारिक अहङ्कार से दश
वैकारिक देव हुये थे । १७ । १८ । दिक्, वायु-सूर्य-प्रचेता-अश्विनी-
कुमार — वहिन इन्द्र — उपेन्द्र — मित्रक हुये । तेज से तन्मात्राओं के
क्रम के योग से इन्द्रियाँ हुई हैं । १६। भूतादिक अहङ्कार से पाँच
भूतों ने जन्म धारण किया था। पहिले शब्द से आकाश — स्पर्श से
वायु — रूप से हुताशन हुआ था । २० ।
रसादम्भः क्षमा गन्धादिति तेषां समुद्भवः ।
स्वच्छंवियन्मरुत्कृष्णोरक्तोऽग्निर्विशदं पयः ।२१
पीता भूमिः पञ्च भूतान्येकैकाधारतोविदुः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा भूतगुणाः स्मृताः ।२२
वृत्तं दिवस्तत्षड् बिन्दुलाञ्छितं मातरिश्वनः ।
त्रिकोणं स्वस्तिकोपेतं वह्ने रद्धेन्दुसंयुक्तम् । २३
अम्भोजमम्भसो भूमेश्चतुरस्रं सवज्रकम् ।
तत्तद्भूतसमाभानि विदुर्बुधाः ।२४
वर्णैः स्वैरञ्चितान्याहुः स्वस्वनामावृतान्यपि ।
धरादिपञ्चभूतानां निवृत्त्याद्याः कलाः स्मृताः ।२५
रस से जल, गन्ध से भूमि, इस रीति से उनकी उत्पत्ति होती है ।
आकाश स्वच्छ है—मरुत् का कृष्ण वर्णहोता है—अग्नि रक्तवर्ण वाला
है, पय विशद होता है। भूमि पीतवर्ण वाली होती है । ये पाँच भूत
हैं जो एक एक के आधार से समझे जाते हैं । शब्द — स्पर्श — रूप —