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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

श्री शारदा तिलक ] [ ११
शब्दब्रह्मेति तं प्राहुः सर्वागमविशारदाः ।
शब्दब्रह्मेति शब्दार्थ शब्दमित्यपरे विदुः (जगुः) ।१२
न हि तेषां तयोः सिद्धि र्जडत्वादुभयोरपि ।
चैतन्यं सर्वभूतानां शब्दब्रह्मेति मे मतिः ।१३
तत्प्राप्य कुण्डलीरूपं प्राणिनां देहमध्यगम् ।
वर्णात्मनाऽऽविर्भवति गद्यपद्यादिभेदतः ।१४
अथ विन्दात्मनः शम्भोः कालबन्धोः कलात्मनः ।
अजायत जगत्साक्षी सर्वव्यापो सदाशिवः ।१५
संज्ञान-इच्छा और क्रिया के स्वरूप वाले अग्नि, चन्द्र और सूर्य के
स्वरूप से युक्त भिद्यमान पर विन्दु से एक अव्यक्त स्वरूप वाला 'ख'
हुआ था । ११ । उनको ही सब आगमों के विशारदों ने शब्द ब्रह्म
कहा था । शब्द ब्रह्म-यह शब्दार्थ है । दूसरों ने इसको शब्द यही
समझा था । १२ । उनकी सिद्धि उन दोनों के ही जड़ होने से नहीं
हुई थी । मेरी मति तो यही है कि समस्त प्राणियों का चैतन्य ही शब्द
ब्रह्म है । १३ । वह प्राणियों के देह के मध्य में स्थित कुण्डली के रूप
को प्राप्त करके वर्णों के स्वरूप से गद्यों और पद्यों के भेद से आविर्भूत
हुआ करती है । १४ । इसके अनन्तर काल के बन्धु कला के स्वरूप
से युक्त विन्दु स्वरूप शम्भु से जगत् के साक्षी-सबमें व्याप्त रहने वाले
सदाशिव समुत्पन्न हुये थे । १५।
सदाशिवाद् भवेदीशस्ततो रुद्रसमुद्भवः ।
ततो विष्णुस्ततो ब्रह्मा तेषामेवं समुद्भवः । १६
मूलभूतात्ततोऽव्यक्ताद्विकृतात्परवस्तुनः ।
आसीत्किल महत्तत्वं गुणान्तः करणात्मकम् । १७
अभूत्तस्मादहङ्कारस्त्रिगुणः (विधिः) वृष्टिभेदतः ।
वैकारिकादहङ्काराद्देवा वैकारिका दश । १८
दिग् वातार्कप्रचेतोविश्ववह्वीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ।
तैजसादिन्द्रियाण्येव तन्मात्राक्रमयोगतः । १६