शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ ] [ श्री शारदा तिलक
षष्ठ पटल
अथ वर्णतनुं वक्ष्ये विश्वबोधविधायिनीम् ।
यस्यानुपलब्धायां सर्वमेतज्जगज्जडम् ।१
ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टो गायत्रं छन्द ईरितम् ।
सरस्वती समाख्याता देवता देशिकोत्तमैः ।२
अक्लीवह्रस्वदीर्घान्तैर्नतैः षड्वर्गकैः क्रमात् ।
षडङ्गानि विधेयानि देशिकैर्जातिसंगुतम् ।३
पञ्चाशल्लिपिभिर्विमुक्तमुखदन्तो पन्मध्यवक्षःस्थलां
भास्वन्मौलिनिवद्धचन्द्रशकलात्तो नतुङ्गस्तनीम् ।
मुद्रामक्षगुणं सुधाढयकलशं विद्यां च हस्ताम्बुजैः
बिभ्राणां विशदप्रभां त्रिनयनाँ वाग्देवतामाश्रये ।४
ललाटमुखवृत्ताक्षिश्रुतिघ्राणेषु गण्डयोः ।
ओष्ठदन्तोत्तमाङ्गास्ये दोःपत्सन्ध्वग्रकेषुच ।५
पार्श्वयोः पृष्ठतो नाभौ जठरे हृदयेऽसके ।
ककुद्यं से च हृत् पूर्व पाणिपाद्युगे तथा ।६
जठराननयोन्यंस्त्येन्मातृ कार्णान्यथाक्रमात् ।
त्वगसृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रमकान्विदुः ।७
इसके अनन्तर वर्ण तनु अर्थात् मातृका का वर्णन करूँगा जो विश्व
के बोध की कराने वाली होती है जिसके उपलब्ध न होने पर यह
सम्पूर्ण जगत् जड़ होता है ।१। उत्तम आचार्यों ने इसका ऋषि ब्रह्मा-
गायत्र छन्द कहा है । और सरस्वती देवी इसकी देवता कही गई है ।
।२। आचार्यों को आक्लीव, ह्रस्व, दीर्घ अन्त वाले षड् वर्गों के द्वारा
क्रम से जाति संयुत षट् अङ्ग करने चाहिए ।३। पचास लिपियों से
विमुक्त मुख-दाँत और मध्य में वक्षः स्थल वाली, जो मस्तकमें बाँधे हुए
देदीप्यमान चन्द्र की कला से संयुत है, जिसके कुच युग स्थूल और