शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२० । । श्रीशारदा तिलक
प्रज्वलोऽग्निस्तथा जिह्वा एतदेवाग्निलक्षणम् ।
आस्यान्तर्ज हुयादग्नेर्विपश्चित्सर्वकर्मसु । १५६
कर्णेहोमे भवेद्व्याधिर्नेत्रे ऽन्धत्वमुदीरितम् ।
नासिकायां मनः पीडा मस्तते धनसंक्षयः । १५७
देशिकों के द्वारा चन्दन, अगुरु, कपूर कस्तूरी, कुंकुम और
तिन्तिडीके बीजोंका परिमाण कहा गया है । १५३। देशिकको समिधाओं
के होमों में वैश्वानर को स्थित हुये का ध्यान करना चाहिए । आज्य
के द्वारा होमों में शयन किये हुए और शेष वस्तुओं में निषण्ण हुए का
ध्यान करे । १५४। धूम के सहित अग्नि को शिर जानना चाहिए और
निर्धूमको चक्षुजाने । जलता हुआ कृष्ण कर्ण होता है तथा काष्ठ अग्नि
का मन होता है । १५५। प्रज्वलित अग्नि जिह्वा है-यह ही अग्नि का
लक्षण होता है । विद्वान् सभी कर्मों में अग्नि के मुख के अन्दर होम
करे । कर्ण के होम में व्याधि होती है ओर नेत्र के होम में अन्धापन
कहा गया है । नासिका के होम में पीड़त होती है और मस्तक के होम
करने में धन का क्षय हुआ करता है। १५६-१५७।
स्वर्णसिन्दूरवालाककुङ्कुमक्षौद्रसन्निभः ।
सुवर्णरेतसोवर्णः शोभनः परिकीर्तितः । १५८
वेरीवारिदहस्तीन्द्रस्वनिर्वह्नेःशुभावहा ।
नागचम्पकपुन्नागपाटला यूथिकानिभः । १४६
पद्मेन्दीवरकल्हारसर्पिर्गुग्गुलुसन्निभः ।
पावकस्य शुभो गन्ध इत्युक्तं तन्त्रवेदिभिः । १६०
प्रदक्षिणास्त्यक्तकम्पाइछत्राभाः शिखिनः शिखाः ।
शुभदा यजमानस्य राज्यस्यापि विशेषत । १६१
कुन्देन्दुधवलो धूमो वह्ने : प्रोक्तः शुभावहः ।
कृष्णः कृष्णगतेर्वर्णो यजमानं विनाशयेत् । १६२
स्वर्ण, सिन्दूर, बालाक, कुंकुम और क्षोद्र के सदृश सुवर्ण रेत
का वर्ण परम शोभन कीर्तित किया गया है । १५८। वह्नि की ध्वनि