सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें० सौंदर्य लहरी
[ती]नों को प्रलय कालीन महासुप्ति अवस्था में दिखाया गया है ।
[प्रे]त=( प्र+इत ) का अर्थ है प्रकर्ष रूप से गया हुआ । प्रत्येक श्वास
[में] प्राणिमात्र का हंसः अथवा सोहं जप होता रहता है,
‘हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ।
हंसहंसेत्यमुंमंत्रं जीवोजपति सर्वदा ॥’
इसको अजपाजप अथवा अजपा गायत्री कहते हैं ! जप
[य]द्यपि स्वतः होता है, परन्तु उस पर हेतु सहित ध्यान रखने से ही
[ज]ाप का फल हो सकता है । उच्छ्वास के समय सः और निःश्वास के
[स]मय हं बीज का शब्द स्वतः होता रहता है । यदि इस के जोड़े का
[वि]योग हो जाय तो श्वास की गति रुकने से यातो मृत्यु हो जावेगी
[अ]थवा समाधि हो जायगी । प्रभव के लिये शिव का शक्ति सहित रहना
[आ]वश्यक है । ब्रह्मा विष्णु और हर तीनों क्रमशः रजोगुण, सत्वगुण
[औ]र तमोगुण की शक्तियों से सृष्टि स्थिति संहार करते हैं, इसलिये
[आ]दि शक्ति की अराधना के सिवाय उनमें कुछ भी करने का सामर्थ्य
[न]हीं । आदि शक्ति जब इन त्रिदेव की भी आराध्या हैं, तो हम
[जै]से अकृत पुण्य उसकी शरण में भी जाने के योग्य कैसे हो सकते हैं,
[प्]रार्थना अथवा स्तुति करना तो दूर की बात हैं । इसलिये मुमुक्षुओं
[क]ो भगवती की शरण में रहकर आराधना करना आवश्यक है ।
सृष्टि की रचना ब्रह्मा (विरंची) करते हैं और शिव (हर)
[ब्र]ह्म कारणवाद संहार करते हैं परन्तु यहां पर सृष्टि का प्रभव
शिवजी से होता है एसा कहने से शिव या हर
शब्द परम शिव अर्थात ब्रह्म वाचक समझना चाहिये ।
१. अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, २ जन्माद्यस्यंयतः