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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 415 में से

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पृष्ठ 69

सौंदर्य लहरी २९
( १ )
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥
अर्थः—यदि शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि करने
को शक्तिमान होता है और यदि ऐसा न होता तो वह ईश्वर
भी स्पन्दित होने को योग्य नहीं था इसलिये तुझे हरि और
ब्रह्मा की भी आराध्य देवता को किसी भी पुण्यहीन मनुष्य में
प्रणाम करने अथवा स्तुति करने की प्रवृत्ति कैसे हो सकती है ?
संक्षिप्त टिप्पणी:—
(१) शक्ति इच्छा ज्ञान क्रिया भेद से त्रिधा होती है, उस के
बिना शक्ति रहित शिव कुछ नहीं कर सकता । शिव हं वाच्य है
और शक्ति सः वाच्य, इसलिये इस श्लोक से हंसः मंत्र सिद्ध होता है
जिसको उलटा करने से सोऽहं बनता है । सोहं में से स और ह
दोनों अक्षरों को हटा दिया जाय तो ॐ शेष रह जाता है । ॐ
निर्गुण अक्षर ब्रह्म वाचक है, हंस जीव वाचक और सोहं ब्रह्मात्मैक्य
पद है । ह, स दोनो हादि विद्या के प्रथम दो अक्षर हैं,
इसलिये सौन्दर्य लहरी में प्रतिपाद्य आनन्द लहरी पद से श्री विद्या
का संकेत करते हैं और यह श्लोक इस ग्रंथ का प्रथम मंगलाचरणार्थ
लिखा गया है । ह और स दोनों के योग से ह्सौ बीज मंत्र भी
बनता है, जिसको प्रेत बीज कहते हैं । इस बीज में शिव शक्ति