सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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में विलिनीकरण होता है, इसी अभिप्राय से हवन में आहुतियां
देने से वे जिस जिस देवता को लक्ष्य करके दी जाती हैं, उसी
देव को पहुंचती हैं, क्योंकि ब्रह्म में सब ही देवों का समावेश है।
भगवान गीता में कहते हैं कि:—
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपिमामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ गीता (९,२३)
अहं हि सर्व यज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्तिते ॥
गीता (९,२४)
अर्थात् जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर किसी भी अन्य देवता का
भजन करते हैं, वे मेरा ही भजन करते हैं। उनका वह भजन विधीपूर्वक
नहीं होता, क्योंकि वास्तव में सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु मैं ही हूं,
परन्तु वे मेरे तात्विक स्वरूप को नहीं जानते, इस लिये उनका
उपास्यभाव परमतत्व से च्युत होकर नीचे के स्तरों पर रह जाता है।
ऐतरेयब्राह्मण की श्रुति कहती है कि 'अग्निर्मुखं प्रथमो
देवतानाम्' (१,४)। अर्थात् अग्नि सब देवताओं में प्रथम
है, इसलिये सब का मुख है। शिव का प्रथम स्पन्द शक्ति के रूप में
प्रकट होता है इसलिये शक्ति ही सर्व प्रथम देवता है और वह स्वयं
अग्नि स्वरूप ही है। ललिता सहस्रनाम में भी भगवती को चिदग्निकुण्ड
सम्भूता कहा गया है अर्थात् चिद्ब्रह्म वह अग्निकुण्ड है जिसमें से
भगवती की उत्पत्ति होती है, इसीलिये महात्रिपुरसुन्दरी को चिति
शक्ति कहते हैं। चित् और चित् से उत्पन्न होनेवाली चितिशक्ति