सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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लिनी के जागरणोपरांत् अन्तर्याग रूपी षड्चक्र बेध होकर परमतत्व
के अनुभव प्राप्त करने पर होता है ।
११ से १३ श्लोकों में बहिरुपासना के लिये ब्रह्माण्ड के
प्रतीक स्वरूप यंत्र का वर्णन और पश्चात् जगत् नियन्त्री का ध्यान
एवं अर्चन का फल कहा है, फिर १४ से २१ तक अभ्यन्तर साधन
के लिये षट्चक्रों का रहस्य और ध्यान बता कर मूलबीज मन्त्र
स्वरूप कामकला की ओर लक्ष्य कराया गया है । इस प्रकार
मन्त्रयोग द्वारा लय योग राजयोग के सोपान क्रम के पश्चात् भक्ति
उपासना से महावाक्योत्थ ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान की उपलब्धि २२ से ३०
श्लोक तक कही गई है । तत्पश्चात् श्रीविद्या की उत्कृष्टता ३१ वें
श्लोक में बता कर ३२, ३३ श्लोकों में पचदशी का उद्धार और
३४, ३५ में समष्टि व्यष्टि गत शक्ति एवं उसके परिणामों द्वारा
वाचारम्भण मात्र नामरूपात्मक व्यापारों में सूत्रात्मा शिव का अन्वय
व्यतिरेक ज्ञान से विवेचन किया गया है । और ३६ से ४१ तक
षट्चक्रों का विशेष विवरण दिया गया है । शेष ग्रन्थ में विराट्रूपा
भगवती के ध्यानार्थ और अन्तर्यागार्थ मानसिक उपचारों का सुन्दर
निरूपण किया गया है ।
भगवती का वर्ण अरुण अर्थात् लाल माना जाता है, इसलिये
उसका एक नाम अरुणा भी है । वेद और तन्त्र अग्नि को ही
शक्ति का रूप मानते हैं, चिदग्नि, ब्रह्माग्नि, ज्ञानाग्नि पदों के
प्रयोग इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं । अग्नि का भी वर्ण अरुण है ।
अग्नि जब शान्त हो जाती है, तब उसका अपने कारण स्वरूप ब्रह्म