सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 363

सौंदर्य लहरी ३१३
वाला कुरुण्टक, और नीले रंग वाले को झिंटी कहते हैं । कुत्सित् है
'रव' अर्थात् शब्द जिसका वह कुरवक ।
अर्थः— विधाता की स्त्री सरस्वती को क्या कितने ही
कविजन नहीं भजते ? और कौन थोड़ा सा भी धनवान होकर
लक्ष्मी का पति नहीं होता ? (धनाढ्य को धनपति या
लक्ष्मि पति कहने लगते हैं) । परन्तु हे सति सतियों में श्रेष्ठ !
महादेव को छोडकर तेरे कुचों का संग तो कुरवक तरु को
भी दुर्लभ है ।
यहां भगवती का आसंग आलिंगन करने से शक्ति के जागृत
होने पर उसकी क्रिया अथवा उसके आवेश का अपने शरीर में
अनुभव करने का अभिप्राय है, परन्तु वह कुरवक जैसे कषाय युक्त
कुतर्की कुवादियों को सुलभ नहीं होता, शक्ति जागृत होने पर तो
मनुष्य शिवतुल्य हो जाता है । कवि होना और धनवान होना
सुलभ है परन्तु भगवती का कृपा पात्र बनना कठिन है ।
(९८)
गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेःपत्निं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया काऽपित्वं दुरधिगम निःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥
अर्थः— हे पर ब्रह्म की महाराज्ञि ! शास्त्रों के जानने
वाले ब्रह्मा की पत्नि को सरस्वती वाक देवी कहते हैं, विष्णु