सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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वाले ये देवगण तेरे द्वार के निकट खडी रहने वाली अणिमादि की
अतुल सिद्धियों तक ही पहुंच पाते हैं ।
देवताओं के पास जो अणिमादि सिद्धियां होती हैं, उनका
स्थान भगवती के अन्तःपुर के द्वारों के बाहर ही है, जैसाकि श्रीचक्र
के भूगृह के बहिर्द्वारों पर उनका स्थान बताया जाता है, और
असंयतेन्द्रिय चंचल चित्त वाले मनुष्यों की तो वहां तक गति ही
दुर्लभ है । उनको तो भगवती की पूजा करने का भी सौभाग्य प्राप्त
नहीं होता, कहा है देवो भूत्वा देवं यजेत् । और सिद्धियां भी अन्तःपुर
में प्रवेश नहीं कर पातीं ।
इस श्लोक में असंयमी और सिद्धियों की कामना रखने वाले
मनुष्यों की निन्दा की गई है और अगले श्लोक में कुरवक तरु
(काँटेदार वृक्षों) के सदृश कषायों से युक्त कुत्सित् मनुष्यों में
शक्ति के जागरण होने की असंभावना दिखाई गई है ।
(९७)
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपिधनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासंगः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥
कुरवक=एक प्रकार का वृक्ष, जिसमें पीत, रक्त और नीले रंग
के पुष्प होते हैं । लाल फूलों वाला कुवरक कहलाता है, पीले फूलों