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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

२७० सौन्दर्य लहरी
( ६५ )
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्रैः कवचिभि—
र्निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकवलाः ॥
कठिन शब्द:— शिरस्र=शिर कवच, विशाख=षडानन
अर्थ:--हे मां ! दैत्यों को रण में जीतकर अपहृत शिरस्र
और कवचों को उतारकर, शिवजी के निर्माल्य से विमुख जो
चंड का भाग होता है, स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र तीनों तेरे मुख
के पान के ग्रास को, जिसमें चन्द्रमा जैसे स्वच्छ कपूर के
टुकडे पड़े हैं, ग्रहण करते हैं ।
जैसे मां अपने छोटे २ बालकों को अपने मुख से निकालकर
बड़े प्रेम से आधे चबे पान के टुकड़े खिलाया करती है, वैसे ही
भगवती स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र को, जो उसके बालक हैं, दैत्यों
पर जय प्राप्त करने पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप अपने मुख से
निकालकर तांबूल के टुकड़े खिलाती है । चण्ड शंकर के एक गण
का नाम है, उसका स्थान नन्दी के दक्षिण हाथ की ओर उसके
और जलहरी के बीच में होता है । शंकर का निर्माल्य चंड का ही
भाग होता है, दूसरा उसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसलिये चण्ड
के पास खड़े होकर शंकर की पूजा नहीं की जाती, वह सब निष्फल