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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

२६० सौन्दर्य लहरी
[ ५७ ]
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
अर्थः—हे शिवे ! किंचित् विकसित् नीलोत्पल की
शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया
दूरस्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो
जायगा, और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं हैं, क्योंकि
चन्द्रमा की किरणें बन में और महलों में समान रूप से पडती हैं ।
कनपटियों का ध्यानः—
[ ५८ ]
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदंडकुतुकम्
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस—
न्नपांगव्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अरालं=वक्र; पाली=कनपटीकोण;
अग=पर्वत; अपांग=कटाक्ष ।