सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ सौंदर्य लहरी
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निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥
अर्थः—हे धरणिधर राजन्य हिमाचल की पुत्री ! सन्तों
का कहना है कि तेरे निमेष (नेत्र बंद करने) से जगत् का प्रलय
और उन्मेष अर्थात् नेत्र खोलने से उद्भव अर्थात् सृष्टि होती है ।
यह सारा जगत् प्रलय के पश्चात् तेरे उन्मेष से उत्पन्न हुआ है,
उसकी रक्षा करने के लिये ही मुझे शंका होती है, कि तेरी
आंखों ने झपकना बंद कर रखा है ।
आंखों का झपकना इस लिये बन्द कर रखा है कि कहीं
झपकने के साथ तुरन्त प्रलय न हो जाय । देवताओं के नेत्रों में
झपकियां नहीं पडतीं; इस लिये भगवती के नेत्र भी सदा निमेषो-
न्मेषरहित रहते हैं, यह बात इस श्लोक में कही गई है । यदि कहो
कि कमल खिला रहता है और मछलियों के नेत्र भी नहीं झपकते,
तो अगला श्लोक लिखते हैं किः—