सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

२५६ सौंदर्य लहरी
रहे हैं, और महा प्रलय के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को
जो प्रलय काल में उपरत हो गये थे, फिर पैदा करने के लिये
रज, सत्व और तम तीनों गुणों को धारण किये हुए से
प्रतीत होते हैं ।
रजो गुण रक्त वर्ण है, सत्व शुक्ल वर्ण और तमो गुण
कृष्ण वर्ण है । भगवती के दो नेत्र चन्द्र सूर्यात्मक श्वेत और
कृष्ण वर्ण हैं, और तीसरा नेत्र मस्तक में आग्नेय रक्त वर्ण है ।
महा प्रलय में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी लीन हो जाते हैं,
परन्तु शक्ति ब्रह्म के साथ अव्यक्त रूप में बनी रहती है ।
प्रलय के अन्त में व्यक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु, और रुद्र को फिर
अपने नेत्रों के उन्मीलन से उत्पन्न करती है । ब्रह्मा रजो गुण
के, विष्णु सत्व गुण के और रुद्र तमो गुण के अधिदेव हैं,
इसलिये मानों भगवती के तीनों नेत्रों के खुल जाने पर वह उन
में सत्व, रज और तम रूपी तीन प्रकार का अंजन आंज लेती
हैं । अर्थात् भगवती की दृष्टि तीन गोलकों का आश्रय लेने से
तीनों के रूप में व्यक्त होती हैं । यद्यपि दृष्टि की शक्ति एक
ही है तो भी तीन प्रकार के गुण रूपी अंजनों के कारण त्रिधा
प्रतीत होती है, क्योंकि तीनों में सृष्टि स्थिति संहार करने की
तीनों शक्तियां एक ही शक्ति के तीन रूप हैं ।