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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

सौन्दर्य लहरी २५५
अर्थः — हे पर्वतराज के कुल की प्रमुख कली ! ये तेरे बाणों
सदृश दोनों नेत्र कानों तक पहुंचे हुए हैं, जो पंखों के स्थान पर
पलकें धारण किए हुए हैं, और पुरारि के चित्त की शान्ति को
भंग करने वाले फल से युक्त हैं, कान तक ताने हुए ये कामदेव
के बाणों का कार्य कर रहे हैं ।
बाणों को गति देने के लिये पंख लगाये जाते हैं, और चीरने
का कार्य करने के लिये अग्र भाग में लोहे का फल होता है, यहां
पलकें पंखवत् हैं, और कटाक्ष का फल शंकर के शान्त चित्त
को भंग करने वाला फल है। यहां फल शब्द उभयार्थ प्रयुक्त है;
और धनुष चढाने पर बाण को कान तक ताना जाता है, इस प्रकार
दोनों नेत्रों की पूर्ण उपमा कामदेव के बाणों से दी गई है । काम
देव के बाणों का प्रहार मनुष्यों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है,
इसी प्रकार देवी का कटाक्ष शंकर के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता
है, अर्थात् परब्रह्म में स्पन्द उत्पन्न करता है ।
[ ५३ ]
विभक्तत्रैवर्ण्य व्यतिकरितलीलाऽञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं विभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव (स्वयमिव) ॥
अर्थः— हे ईशान की दयिते ! ये तेरे तीनों नेत्र तीन
रंग का अंजन लगाने से मानों पृथक् २ तीन रंग के चमक