सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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परिहास करता है । जिनमें स्फटिक सदृश शोभा वाले दन्तों में
किंचित् मुस्कराते समय निकलने वाली सुगंध पर काम के दहन
करने वाले शिवजी के नेत्र रूपी भौंरे मस्त हो जाते हैं ।
मानो शिवजी भी जिन पर काम का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं.
प्रकृति के सौंदर्य से मुग्ध हो रहे हैं अर्थात् वह निर्गुण ब्रह्म प्रकृति
के गुणों का भोक्ता भी है । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृच ।
(गीता १३, १४)
ललाट का ध्यान;—
( ४६ )
ललाटं लावण्यद्युति विमलमाभाति तव यद्
द्वितीयं तन्मन्ये मुकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासान्यामादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— मिथ=अकेला; स्यूतिः=सीवन, जोड;
विपर्यन्यास=एक दूसरे से उलट ।
अर्थ:—लावण्य कांति सें युक्त विमल चमकने वाला जो
तेरा ललाट है, उसे मैं मुकुट में जडी हुई चन्द्रमा की दूसरी
कला समझता हूं, जो एक दूसरे पर उलट कर रखी होने के
कारण दोनों का एक रूप बनकर और अमृत के लेप मे जुड
कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है ।