सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी
के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती
हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल
किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार
रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।
स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु
भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में
ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के
सदृश समझना चाहिये ।
अलकों का ध्यानः—
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अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=
मुस्कराहट; दर=किंचित्, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौरा;
अलक=जुल्फ ।
अर्थः—स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त
अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का