सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

२३० सौंदर्य लहरी
होता है कि शंकर भगवत्पाद ने इन दोनों चक्रों में विशेष रूप से
समयाचार की ओर लक्ष्य कराया है, क्योंकि उनका ध्यान कौल
मत वालों को ही अभीष्ट है । समयाचार वालों को ऊपर के चक्रों
पर विशेष ध्यान देना चाहिये, मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों पर
नहीं । इसका कारण हम अन्यत्र भी कह आये हैं । देखें श्लोक ९ ।
स्वाधिष्ठान चक्र के वेध से वीर्यपात इत्यादि की क्रियायें होने की
सम्भावना है, और ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के
साधकों का उन क्रियाओं से पतन होने की आशंका है, इसलिये
वेध क्रम को भी इसी प्रकार बताया गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र को
नहीं छोडा जाता । यह स्मरण रहे कि ऊपर के अनाहत् अथवा
आज्ञा चक्र का पूर्ण वेध होने पर नीचे के चक्रों का भी वेध स्वयं
हो जाता है । इसलिये काम वासना की दीप्ति से रक्षा करने के
लिये अनाहत् चक्र और आज्ञा चक्रों का अथवा नादानु-सन्धान
का आश्रय लेना श्रेयस्कर है । हृदय चक्र में दहर विद्या, आज्ञा
चक्र में शांभवी विद्या और नाद श्रवण तीनों के साधन शुद्ध और
ऊंचे हैं । एक शांभवी मुद्रा के साधन से ऊर्ध्वरेतत् की सिद्धि के
साथ २ खेचरत्व की सिद्धि हो जाती है । फिर बज्रौली क्रिया की
झंझट वृथा मोल लेकर पथभ्रष्ट होने की संभावना का क्यों आवा-
हन किया जाय ।
पृथिवी तत्व की ६४ किरणें आधी २ ताण्डवनटेश्वर और
लास्य परा समया देवी से उद्भूत समझनी चाहियें ।